Shekh nawab
Shekh nawab

"जब कर्म सेवा के लिए हों और नीयत साफ़ हो, तो जीवन खुद एक संदेश बन जाता है।"

भूमिका

डॉ. शेख नवाब अहमद का जीवन साधारण परिस्थितियों से शुरू होकर असाधारण उपलब्धियों तक पहुँचने की कहानी है। वे केवल एक व्यक्ति नहीं थे, बल्कि समाज के लिए एक विचारधारा, एक मार्गदर्शक और एक प्रेरणा बनकर उभरे। उनके जीवन में आने वाली कठिनाइयाँ साधारण इंसान को तोड़ सकती थीं, लेकिन उन्होंने हर चुनौती को अवसर में बदलना सीखा। यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी। वह मानते थे कि संघर्ष इंसान को मज़बूत बनाता है और सच्चाई इंसान को ऊँचा उठाती है। यही सोच उन्हें भीड़ से अलग करती थी।

बचपन और युवावस्था में जिन मुश्किलों का सामना उन्होंने किया, वे उनके व्यक्तित्व को गढ़ने वाली ठोस नींव साबित हुईं। शिक्षा की राह आसान नहीं थी, लेकिन ज्ञान प्राप्त करने की उनकी जिज्ञासा और दृढ़ निश्चय ने उन्हें हर कठिनाई पर विजय दिलाई। परिवार के संस्कार और स्वर्गीय पिताजी का आशीर्वाद उनके लिए सबसे बड़ी पूँजी थी। यही समर्थन आगे चलकर उन्हें वकालत के क्षेत्र में सफलता दिलाने का आधार बना। उनकी पढ़ाई केवल डिग्री प्राप्त करने तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह समाज को न्याय दिलाने का माध्यम बनी।

वकालत का सफर शुरू करते समय उनके पास केवल विद्या और विश्वास था। उन्होंने अपने पेशे को केवल करियर की तरह नहीं देखा, बल्कि इसे एक सेवा का अवसर माना। अदालत के भीतर और बाहर, वे हमेशा न्याय के लिए खड़े रहे। उनका लक्ष्य केवल मुकदमे जीतना नहीं था, बल्कि उन लोगों की आवाज़ बनना था जिनकी आवाज़ अक्सर दबा दी जाती थी। उनके कार्यों ने यह स्पष्ट कर दिया कि एक वकील केवल कानून का जानकार नहीं होता, बल्कि समाज के लिए न्याय की लड़ाई लड़ने वाला प्रहरी भी हो सकता है।

जब उन्होंने सामाजिक कार्य और राजनीति की ओर कदम बढ़ाए, तब भी उनके मूल्य और सिद्धांत नहीं बदले। उनकी सोच हमेशा यही रही कि समाज को बेहतर बनाने के लिए व्यक्ति को खुद निष्ठा और ईमानदारी से कार्य करना चाहिए। उन्होंने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि राजनीति केवल सत्ता पाने का साधन नहीं है, बल्कि यह समाज की सेवा का सबसे प्रभावी मार्ग हो सकता है। उनके द्वारा किए गए कार्यों ने आम लोगों के जीवन को छुआ और उनमें यह विश्वास जगाया कि सच्चाई और निष्ठा से काम करने वाला नेता सच में जनता का अपना होता है।

आज डॉ. शेख नवाब अहमद का जीवन उन सभी के लिए एक जीवित उदाहरण है जो संघर्षों से गुजर रहे हैं और सच्चाई व मेहनत से अपने सपनों को पूरा करना चाहते हैं। उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि ईमानदारी, परिश्रम और सेवा भाव के साथ जिया गया जीवन केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह आने वाली पीढ़ियों को दिशा दिखाता है। उनका व्यक्तित्व इस बात का प्रमाण है कि इंसान का असली परिचय उसके पद या पदवी से नहीं, बल्कि उसके कर्म और मूल्यों से होता है। यही कारण है कि आज भी उनका नाम समाज में प्रेरणा और आदर्श के रूप में लिया जाता है।

"शेख़ नवाब अहमद सिर्फ़ एक नाम नहीं, बल्कि मेहनत, सच्चाई और इंसानियत का आईना हैं, जिनकी पहचान उनके कर्मों से होती है।"

चरण 1 : संघर्षों से भरा बचपन

महाराष्ट्र के औरंगाबाद ज़िले की कन्नड़ तहसील की मिट्टी ने एक ऐसे सपूत को जन्म दिया, जिसने जीवन की कठिनाइयों को अपनी सबसे बड़ी ताक़त बना लिया। यह सपूत थे – शेख़ नवाब अहमद। बचपन से ही उनके सामने चुनौतियों का अंबार था। परिस्थितियाँ साधारण नहीं थीं, लेकिन उनका हौसला असाधारण था। यही वह दौर था जब उन्होंने सीखा कि कठिनाइयाँ इंसान को तोड़ती नहीं, बल्कि उसे गढ़ती हैं।

बचपन के संघर्ष ने उन्हें क़रीब से जीवन की सच्चाई दिखा दी थी। स्कूल का समय आसान नहीं था। आर्थिक तंगी और सामाजिक परिस्थितियों ने उन्हें बार-बार परखा। लेकिन वे टूटे नहीं। यही वह मोड़ था जब उन्होंने पढ़ाई को छोड़ने के बजाय, पढ़ाई को दूसरों के लिए एक साधन बनाने का संकल्प लिया। उन्होंने घर की परिस्थितियों को देखते हुए छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। यह काम केवल रोज़ी-रोटी का साधन नहीं था, बल्कि शिक्षा के प्रति उनकी गहरी लगन और दूसरों के भविष्य को सँवारने की प्रतिबद्धता का प्रतीक था।

धीरे-धीरे उन्होंने ट्यूशन को एक संगठित रूप दिया। उन्होंने एक संगठन बनाया और अन्य शिक्षकों को भी बच्चों को पढ़ाने की ज़िम्मेदारी सौंपी। इस संगठन का केंद्रबिंदु किसान परिवारों के बच्चे थे। ये वही बच्चे थे, जो अक्सर गरीबी और मज़दूरी की वजह से शिक्षा से वंचित रह जाते थे। शेख़ नवाब अहमद ने इन बच्चों को पढ़ाने की ठानी, ताकि किसानों के परिवारों का भविष्य भी उज्ज्वल हो सके। यही उनके सामाजिक कार्यों की पहली सीढ़ी थी। यह पहल न केवल बच्चों की ज़िंदगी बदलने वाली साबित हुई, बल्कि शेख़ नवाब अहमद के जीवन में भी एक नई दिशा लेकर आई।

उनके लिए शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं थी। वे मानते थे कि ज्ञान ही इंसान को उसके अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक कर सकता है। इसी सोच ने उन्हें लगातार आगे बढ़ने और पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रेरित किया। कॉलेज के दिनों में भी उन्होंने ट्यूशन पढ़ाना जारी रखा। दिन में वे कक्षाओं में पढ़ाई करते और शाम को बच्चों को पढ़ाते। इस संघर्ष और मेहनत का नतीजा यह हुआ कि उन्होंने न केवल अपनी पढ़ाई पूरी की, बल्कि कानून की पढ़ाई में भी सफलता हासिल की।

लेकिन यह सब केवल उनकी पढ़ाई तक सीमित नहीं था। वे स्वभाव से रचनात्मक थे और लेखन उनकी आत्मा का हिस्सा था। लेख और कविताएँ लिखना उनका शौक़ ही नहीं बल्कि समाज के साथ संवाद करने का माध्यम भी था। शब्दों के माध्यम से वे अपने विचार लोगों तक पहुँचाते। आगे चलकर यही रचनात्मकता पत्रकारिता और अख़बार प्रकाशन की ओर ले गई।

       “अंधकार चाहे कितना भी गहरा हो, एक छोटी सी किरण उसे मिटा देती है।”

चरण 2: शिक्षा और सामाजिक सेवा की नींव

जीवन के प्रारंभिक वर्षों में जिस प्रकार का वातावरण व्यक्ति को मिलता है, वही उसके विचारों, दृष्टिकोण और भविष्य की दिशा को आकार देता है। शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह मूल्यों, संस्कारों और समाज के प्रति जिम्मेदारी की भावना को भी गहराई से स्थापित करती है। इसी आधार पर इस चरण को समझना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहीं से आने वाले वर्षों की नींव रखी जाती है।

बचपन में सीमित साधनों और चुनौतियों के बीच पढ़ाई करना आसान नहीं था। लेकिन सीखने की लगन और आत्मनिर्भर बनने की चाह ने उन्हें हर परिस्थिति में आगे बढ़ने की ताकत दी। वे मानते थे कि शिक्षा केवल नौकरी पाने का साधन नहीं है, बल्कि यह इंसान को सोचने, परखने और समाज के लिए कुछ करने की शक्ति देती है। इस सोच के साथ उन्होंने अपने अध्ययन को गंभीरता से लिया। कठिनाइयों के बावजूद वे नियमित रूप से विद्यालय जाते, समय पर कार्य पूरा करते और अपने साथियों के बीच एक आदर्श छात्र के रूप में पहचाने जाते।

उनकी शैक्षणिक यात्रा में सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि वे केवल अंक प्राप्त करने पर ध्यान नहीं देते थे। वे ज्ञान की गहराई को समझने और उसे व्यवहार में उतारने पर विश्वास रखते थे। यही कारण था कि शिक्षकों के बीच उनकी छवि एक ऐसे विद्यार्थी की बनी, जो मेहनती होने के साथ-साथ ईमानदार भी है। यह गुण बाद में उनके सामाजिक कार्यों में भी दिखाई दिया

शिक्षा के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारियों का अनुभव उन्हें परिवार और आसपास के माहौल से मिला। गाँव और कस्बों में रहने वाले लोगों की कठिनाइयाँ उन्होंने नजदीक से देखीं। कई बार वे अपने मित्रों और पड़ोसियों की पढ़ाई में मदद करते, किसी को किताबें उपलब्ध कराते तो कभी किसी के लिए लिखने-पढ़ने का सहारा बन जाते। यह संवेदनशीलता उनके भीतर सेवा भाव को और गहरा करती गई।

विद्यालय के दौरान ही उन्होंने महसूस किया कि समाज में असमानताएँ किस प्रकार लोगों की प्रगति को रोक देती हैं। किसी के पास संसाधनों की कमी है, तो किसी के पास अवसर नहीं। उन्होंने यह भी देखा कि कई बच्चे पढ़ाई छोड़कर मजदूरी करने लगते हैं। इसने उनके भीतर गहरी छाप छोड़ी और शिक्षा को सामाजिक बदलाव का सबसे प्रभावी माध्यम मानने का विचार मजबूत किया।

वे अक्सर विद्यालय के छोटे-छोटे आयोजनों में आगे रहते। धीरे-धीरे वे समझने लगे कि नेतृत्व केवल आदेश देने में नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलने में है। यही कारण है कि साथी विद्यार्थी और शिक्षक भी उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखते थे।

“जब शब्दों में उद्देश्य और समाज के प्रति समर्पण जुड़ जाए, तब लेखन और पत्रकारिता जीवन बदलने की ताकत बन जाती हैं।”

चरण 3: लेखन और पत्रकारिता की ओर रुझान

शेख नवाब अहमद का जीवन शुरू से ही संघर्षों से भरा रहा। बचपन से लेकर युवावस्था तक की चुनौतियों ने उनके व्यक्तित्व को ऐसा गढ़ा कि वे हर कठिनाई को अवसर में बदलते चले गए। किसान परिवारों से जुड़े बच्चों को शिक्षा दिलाने का उनका प्रारंभिक प्रयास ही आगे चलकर सामाजिक कार्य का आधार बना। पढ़ाई के दिनों में उन्होंने न केवल खुद मेहनत की बल्कि दूसरों को भी पढ़ाने का जिम्मा उठाया। ट्यूशन क्लासेस चलाना और बाद में एक संगठन खड़ा करना, जहां विभिन्न शिक्षकों को बच्चों की पढ़ाई की जिम्मेदारी सौंपी गई, उनके सामाजिक दृष्टिकोण की स्पष्ट झलक थी। यह उनका पहला कदम था जिसने उन्हें समाज की गहरी समझ दी और आगे चलकर पत्रकारिता व लेखन की ओर प्रेरित किया।

कॉलेज के दिनों में भी वे ट्यूशन पढ़ाते रहे और इसी दौरान उन्होंने कानून की पढ़ाई पूरी की। शिक्षा और सामाजिक कार्य को साथ लेकर चलना आसान नहीं था, लेकिन उनमें अद्भुत संतुलन की क्षमता थी। इस समय तक लेखन उनका प्रिय शौक बन चुका था। लेख, कविताएँ और विचारों की अभिव्यक्ति उनके जीवन का हिस्सा हो गई थी। यह वही दौर था जब उन्होंने महसूस किया कि लेखनी समाज को जागरूक करने का सबसे सशक्त माध्यम हो सकती है।

पत्रकारिता की ओर उनका वास्तविक रुझान तब शुरू हुआ जब उन्होंने साप्ताहिक समाचार पत्र की शुरुआत की। साधारण संसाधनों और बड़े सपनों के साथ शुरू किया गया यह प्रयास आगे चलकर लोगों तक सच्ची खबरें और सामाजिक मुद्दों की आवाज पहुँचाने का माध्यम बना। उन्होंने हमेशा यह ध्यान रखा कि उनकी भाषा सरल और आमजन तक समझ आने वाली हो। उनका मानना था कि पत्रकारिता केवल पढ़े-लिखे वर्ग तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि हर किसान, मजदूर और सामान्य नागरिक तक उसका संदेश पहुँचना चाहिए।

वर्ष 2004 में उन्होंने दैनिक समाचार पत्र प्रकाशित करना शुरू किया। यह उनके जीवन का एक बड़ा पड़ाव था। लगातार परिश्रम और पत्रकारिता के प्रति समर्पण ने इस समाचार पत्र को समाज में विशिष्ट पहचान दिलाई। वर्ष 2007 में उन्होंने इसकी जिम्मेदारी अपने बच्चों को सौंपी। यह निर्णय केवल एक पारिवारिक हस्तांतरण नहीं था, बल्कि उनके विचारों और मिशन को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने की सोची-समझी रणनीति थी। उन्होंने अपने बेटे शेख सज्जार अहमद और बेटी सना को वही मूल्य दिए जो उन्होंने खुद अपने संघर्षों और अनुभवों से सीखे थे।

आभार संदेश

सभी सम्माननीय मित्रों, शुभचिंतकों, परिवारजन और सहयोगियों का मैं, शेख नवाब अहमद, हृदय से धन्यवाद प्रकट करता हूँ। जीवन की प्रत्येक सफलता, अनुभव और सीख आपके मार्गदर्शन, सहयोग और समर्थन के बिना संभव नहीं हो पाती।

मेरे सामाजिक, शैक्षणिक और पेशेवर कार्यों में जो प्रोत्साहन और भरोसा आपने दिया, उसने मुझे निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। मेरी किताबों, लेखन, जनजागरण और न्याय के पथ पर किए गए प्रयासों में आपका सहयोग मेरे लिए अत्यंत मूल्यवान रहा।

विशेष रूप से मेरे परिवार—मेरी धर्मपत्नी, शादिया बेगम, मेरे पुत्र शेख सज्जर अहमद और पुत्री सना—का अथाह समर्पण और सहनशीलता मुझे हर चुनौती का सामना करने की शक्ति देती है। साथ ही, सभी शिक्षकों, मार्गदर्शकों और मेरे जीवन के प्रेरणास्रोतों का भी मैं धन्यवाद करता हूँ, जिन्होंने मुझे सतत् प्रयास, धैर्य और निष्ठा का महत्व सिखाया।

आप सभी का सहयोग और विश्वास मेरे कार्यों को सार्थक बनाने में सदैव प्रेरक रहेगा। आपके आशीर्वाद और शुभकामनाओं के लिए हृदय से धन्यवाद।

—  डॉ. शेख नवाब अहमद