“कुछ यात्राएँ बाहर से नहीं, भीतर से शुरू होती हैं—और वही यात्राएँ जीवन को उसका वास्तविक अर्थ देती हैं।”

परिचय

यह बायोग्राफी डॉ. माधव अनुरागी के जीवन की उस यात्रा का परिचय है, जो बचपन से ही भीतर उठती अनुभूतियों, प्रश्नों और विश्वासों के साथ आगे बढ़ती रही। यह किसी अचानक मिली पहचान या बाहरी उपलब्धियों की कहानी नहीं है, बल्कि उस क्रमिक प्रक्रिया का विवरण है, जिसमें समय, अनुभव, साधना और सेवा ने मिलकर उनके जीवन की दिशा तय की।

डॉ. माधव अनुरागी का जन्म सरूरपुर कलां, जिला बागपत, उत्तर प्रदेश में हुआ। उनका बाल्यकाल साधारण पारिवारिक वातावरण में बीता, किंतु बचपन से ही उनके स्वभाव में एक अलग तरह की संवेदनशीलता और एकांतप्रियता दिखाई देती थी। ध्यान, शांति और भीतर की अनुभूतियों के प्रति उनका झुकाव स्वाभाविक था। यह झुकाव किसी औपचारिक शिक्षा या बाहरी प्रभाव का परिणाम नहीं था, बल्कि उनके व्यक्तित्व का सहज हिस्सा बनता चला गया। स्कूल जीवन के दौरान भी वे सामान्य बच्चों से अलग अनुभव करते थे—कभी किसी घटना का पहले आभास होना, कभी वातावरण के बदलते भाव को महसूस करना। उस समय वे स्वयं भी नहीं समझ पाते थे कि यह सब क्यों और कैसे हो रहा है।

शिक्षा के क्रम में जब वे दिल्ली आए, तो उनके जीवन का दायरा और व्यापक हुआ। पढ़ाई के साथ-साथ उनके भीतर ज्योतिष विद्या को लेकर जिज्ञासा जागी। यह जिज्ञासा केवल भविष्य जानने तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह समझने की चाह थी कि किसी व्यक्ति के जीवन में चल रही समस्याओं की जड़ क्या है और उनका समाधान कैसे संभव हो सकता है। इसी खोज ने उन्हें अपने गुरु श्री अशोक गौड़ जी तक पहुँचाया। यह भेंट उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ बनी।

गुरु से मार्गदर्शन की इच्छा के साथ जब उन्होंने अपनी बात रखी, तो उन्हें यह स्पष्ट रूप से बताया गया कि यह मार्ग सरल नहीं है। त्याग, अनुशासन और धैर्य—इन सबके बिना इस क्षेत्र में आगे बढ़ना संभव नहीं है। यह स्पष्टता उनके लिए आसान नहीं थी। एक ओर परिवार की अपेक्षाएँ थीं, औपचारिक शिक्षा का मार्ग था और भविष्य को लेकर सामान्य सोच थी; दूसरी ओर भीतर से उठती वह अनुभूति थी, जो साधना और सेवा की ओर बुला रही थी। यह अंतर्द्वंद्व उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण चरण बना।

इसी दौर में उनके जीवन में एक गंभीर दुर्घटना हुई, जिसने उन्हें शारीरिक रूप से लंबे समय तक असहाय कर दिया। यह समय केवल पीड़ा का नहीं था, बल्कि आत्मचिंतन का भी था। डॉक्टरों की सलाह, उपचार और आशंकाओं के बीच उन्होंने अपने भीतर के विश्वास को और गहराई से महसूस किया। उस अनुभव ने उनके मन में यह दृढ़ किया कि जीवन का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों तक सीमित नहीं है, बल्कि किसी व्यापक भाव और जिम्मेदारी से जुड़ा हुआ है।

इसके बाद लिया गया निर्णय सहज नहीं था। घर से दूर जाकर साधना करना, कठोर अनुशासन में रहना और वर्षों तक ब्रह्मचर्य का पालन करना—यह सब किसी एक क्षण में नहीं हुआ। यह निर्णय धीरे-धीरे परिपक्व हुआ। इस यात्रा में उन्हें अपने परिवार का, विशेष रूप से अपने बड़े भाई पंडित कम्मवीर अनुरागी का सहयोग मिला, जिन्होंने हर कठिन समय में उन्हें संबल दिया। साथ ही, गुरु का मार्गदर्शन और आसपास के लोगों का सहयोग भी उनके साथ बना रहा।

“कुछ प्रवृत्तियाँ सिखाई नहीं जातीं, वे भीतर से जन्म लेती हैं—और समय के साथ जीवन की दिशा बन जाती हैं।”

चरण 01 : बचपन, संस्कार और भीतर जागती अनुभूतियाँ

डॉ. माधव अनुरागी का जीवन उस सामान्य प्रारंभ से आगे बढ़ता है, जहाँ बचपन केवल उम्र का एक पड़ाव नहीं होता, बल्कि व्यक्तित्व की नींव बनता है। उत्तर प्रदेश में जन्मे डॉ. माधव अनुरागी का प्रारंभिक जीवन सादगी, पारिवारिक संस्कारों और एक शांत वातावरण में बीता। उनका बचपन किसी विशेष सुविधा या असाधारण परिस्थितियों से नहीं, बल्कि साधारण घरेलू जीवन से जुड़ा रहा। किंतु इसी साधारणता के भीतर कुछ ऐसा था, जो उन्हें धीरे-धीरे अलग बनाता चला गया।

बचपन से ही उनके स्वभाव में एक सहज गंभीरता दिखाई देती थी। वे अन्य बच्चों की तरह शोर-शराबे या बाहरी आकर्षणों में अधिक नहीं उलझते थे। एकांत में बैठना, चुपचाप चीज़ों को देखना और भीतर ही भीतर विचारों में खो जाना—यह उनके लिए असहज नहीं, बल्कि स्वाभाविक था। परिवार ने भी यह महसूस किया कि उनका झुकाव सामान्य बाल-सुलभ चंचलता से थोड़ा अलग है। यह अंतर किसी बनावटी अनुशासन से नहीं, बल्कि उनकी आंतरिक प्रवृत्ति से उपजा हुआ था।

उनके पिता वेदपाल का व्यक्तित्व और जीवन-दृष्टि इस बचपन पर गहरा प्रभाव डालती रही। घर में आध्यात्मिक विषयों पर सहज बातचीत होती थी, और जीवन को केवल भौतिक उपलब्धियों से नहीं, बल्कि संस्कारों और आचरण से देखने की समझ दी जाती थी। इन बातों ने डॉ. माधव अनुरागी के मन में जीवन को लेकर एक गहराई पैदा की। यह गहराई धीरे-धीरे उनके सोचने के ढंग में झलकने लगी।

विद्यालय का जीवन भी उनके लिए केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं रहा। स्कूल के दिनों में उन्होंने कई ऐसे अनुभव किए, जिन्हें वे उस समय शब्दों में नहीं बाँध पाते थे। कभी किसी दिन का वातावरण उन्हें पहले से अलग लगता, कभी किसी घटना का आभास पहले ही हो जाता। यह सब उनके लिए डर या भ्रम का कारण नहीं बना, बल्कि एक सहज अनुभूति की तरह उनके साथ चलता रहा। वे स्वयं भी नहीं जानते थे कि ऐसा क्यों होता है, पर यह उनके जीवन का हिस्सा बन चुका था।

बचपन में ही ध्यान की ओर उनका झुकाव स्पष्ट दिखाई देता था। वे बिना किसी विधि या निर्देश के शांत बैठना पसंद करते थे। उस समय न उन्हें साधना का अर्थ पता था, न ध्यान की कोई परिभाषा, फिर भी मन की यह अवस्था उनके लिए स्वाभाविक थी। यह वही अवस्था थी, जिसने आगे चलकर उनके जीवन को एक अलग दिशा दी।

परिवार और समाज की सामान्य अपेक्षाएँ भी उनके आसपास मौजूद थीं। शिक्षा, आगे बढ़ने की आकांक्षा और एक स्थिर भविष्य की कामना—यह सब उनके जीवन का भी हिस्सा था। वे पढ़ाई में जुड़े रहे, सीखते रहे और जिम्मेदारियों को समझते रहे। पर भीतर कहीं न कहीं यह भावना बनी रही कि उनका जीवन केवल इन्हीं सीमाओं में नहीं सिमटता। यह भावना उस समय अस्पष्ट थी, पर लगातार मौजूद थी।

“जब मन सवाल पूछने लगे और उत्तर बाहर नहीं, भीतर खोजे जाने लगें—तब जीवन सच में आगे बढ़ता है।”

चरण 02 : शिक्षा, दिल्ली का अनुभव और भीतर चलती खोज

डॉ. माधव अनुरागी के जीवन का यह चरण एक ऐसे समय को दर्शाता है, जब बचपन की शांत अनुभूतियाँ अब स्पष्ट प्रश्नों में बदलने लगी थीं। यह वह दौर था, जब उनका मन केवल सीखने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जीवन को समझने की कोशिश करने लगा। यह परिवर्तन अचानक नहीं आया, बल्कि धीरे-धीरे, अनुभवों के साथ गहराता चला गया।

शिक्षा के उद्देश्य से जब डॉ. माधव अनुरागी दिल्ली पहुँचे, तो उनके जीवन का दायरा पहले से कहीं अधिक विस्तृत हो गया। दिल्ली उनके लिए केवल एक शहर नहीं थी, बल्कि एक अलग दुनिया थी—तेज़ रफ्तार, अलग सोच, अलग जीवनशैली और अनगिनत लोग, जिनकी अपनी-अपनी कहानियाँ थीं। यहाँ रहकर उन्होंने पहली बार इतने अलग-अलग स्वभाव, संघर्ष और परिस्थितियाँ एक साथ देखीं। यह सब उनके भीतर पहले से मौजूद संवेदनशीलता को और गहरा कर गया।

वे अपनी पढ़ाई के प्रति जिम्मेदार थे। अध्ययन चलता रहा, दिनचर्या भी बनी रही, लेकिन मन का एक हिस्सा हमेशा कुछ और तलाश करता रहा। उन्हें लगने लगा कि जीवन केवल किताबों में लिखे उत्तरों से नहीं चलता। उनके आसपास लोग थे, जिनके पास सब कुछ होते हुए भी शांति नहीं थी, और कुछ ऐसे भी थे जिनके पास बहुत कम था, फिर भी उनके चेहरे पर संतोष झलकता था। इन विरोधाभासों ने डॉ. माधव अनुरागी को सोचने पर मजबूर किया।

दिल्ली में रहते हुए उन्होंने लोगों की बातें ध्यान से सुनीं। वे केवल शब्द नहीं सुनते थे, बल्कि उनके पीछे छिपे भावों को महसूस करते थे। किसी की परेशानी, किसी की उलझन, किसी की बेचैनी—इन सबका उन पर गहरा प्रभाव पड़ता था। यही वह समय था जब उनके भीतर यह सवाल स्पष्ट रूप से उभरने लगा कि क्या किसी व्यक्ति के जीवन को गहराई से समझने का कोई मार्ग है? क्या किसी के वर्तमान संघर्ष को उसके अतीत और भविष्य से जोड़कर देखा जा सकता है?

इन्हीं प्रश्नों ने उन्हें ज्योतिष विद्या की ओर धीरे-धीरे आकर्षित किया। यह आकर्षण किसी चमत्कार या दिखावे से नहीं, बल्कि समझने की इच्छा से जुड़ा था। वे यह जानना चाहते थे कि जीवन में जो कुछ घटता है, उसका कोई क्रम, कोई संकेत, कोई कारण होता है या नहीं। यह जानने की चाह केवल अपने लिए नहीं थी, बल्कि दूसरों की समस्याओं को समझने और उन्हें सही दिशा दिखाने की इच्छा से भी जुड़ी हुई थी।

इसी खोज के क्रम में उनकी भेंट उनके गुरु श्री अशोक गौड़ जी से हुई। यह मुलाकात उनके लिए केवल एक शिक्षक से मिलने जैसी नहीं थी, बल्कि जीवन को देखने का एक नया दृष्टिकोण पाने जैसी थी। डॉ. माधव अनुरागी ने गुरु के सामने अपनी जिज्ञासा और मन की बात रखी।

“जब जीवन बार-बार ठहरकर पूछने लगे कि तुम किस ओर जा रहे हो, तब समझ लेना चाहिए कि भीतर कोई बड़ा परिवर्तन आकार ले रहा है।”

चरण 03 : गुरु का मार्ग, बनारस की सीख और भीतर चलता निर्णायक संघर्ष

डॉ. माधव अनुरागी के जीवन का यह चरण वह समय है, जब खोज अब केवल जिज्ञासा नहीं रही, बल्कि एक गहरे उत्तर की माँग बन चुकी थी। दिल्ली में रहते हुए जो प्रश्न उनके मन में जन्मे थे, वे अब अनदेखे नहीं रह पा रहे थे। यह वह दौर था, जब उनका मन बार-बार उनसे यही पूछता था कि क्या वे केवल वही जीवन जीना चाहते हैं, जो सामान्य रूप से सब जीते हैं, या फिर उस मार्ग पर चलना चाहते हैं, जो भीतर से उन्हें बुला रहा है।

इसी क्रम में आगे सीखने और समझ को गहराई देने के लिए डॉ. माधव अनुरागी बनारस पहुँचे। बनारस उनके लिए केवल एक शहर नहीं था, बल्कि साधना, परंपरा और आत्म-अनुशासन की भूमि थी। यहाँ का वातावरण, यहाँ की जीवन-शैली और यहाँ की ऊर्जा उनके मन को भीतर तक छूती थी। ऐसा लगता था जैसे यह स्थान उनसे कुछ कह रहा हो—बिना शब्दों के, केवल अनुभूति के माध्यम से।

बनारस में उन्होंने औपचारिक रूप से ज्योतिष विद्या का अध्ययन भी किया। प्रश्न कुंडली जैसे विषयों के माध्यम से उन्होंने इस विद्या की संरचना को समझा। यह सीख उनके लिए आवश्यक थी, क्योंकि इससे उन्हें यह स्पष्ट हुआ कि यह ज्ञान केवल भावना या विश्वास का विषय नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक व्यवस्थित और शास्त्रीय आधार भी है। वे सीखते रहे, समझते रहे, लेकिन भीतर कहीं यह बात लगातार स्पष्ट होती जा रही थी कि केवल कोर्स पूरा कर लेना इस मार्ग की मंज़िल नहीं है।

यहीं उन्हें यह बात साफ शब्दों में बताई गई कि बिना सिद्धि या कृपा के इस विद्या का कोई वास्तविक प्रभाव नहीं होता। यह बात डॉ. माधव अनुरागी के मन में गहराई से उतर गई। उन्होंने महसूस किया कि यदि उन्हें इस मार्ग पर आगे बढ़ना है, तो आधे मन से नहीं, बल्कि पूरे समर्पण के साथ बढ़ना होगा। यह समझ उनके भीतर एक नए संघर्ष को जन्म दे रही थी।

इस समय उनके जीवन में कई दिशाएँ एक साथ खिंचाव पैदा कर रही थीं। एक ओर पढ़ाई चल रही थी, और परिवार की अपेक्षाएँ भी थीं। उनके पिता चाहते थे कि वे पढ़-लिखकर ऐसा जीवन चुनें, जिसमें स्थिरता हो, सम्मान हो और भविष्य सुरक्षित हो। यह इच्छा पूरी तरह स्वाभाविक थी, और डॉ. माधव अनुरागी उसका सम्मान भी करते थे। दूसरी ओर, उनके भीतर यह भावना लगातार मज़बूत हो रही थी कि उनका मन किसी और ही दिशा में शांति पाता है।

यह संघर्ष बाहर से दिखाई देने वाला नहीं था। यह भीतर का संघर्ष था—जहाँ वे किसी को दोष नहीं दे सकते थे, न ही किसी से शिकायत कर सकते थे। वे अपने परिवार की भावनाओं को समझते थे और स्वयं भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं थे कि आगे क्या करना सही होगा। इसी कारण उन्होंने जल्दबाज़ी में कोई निर्णय नहीं लिया। वे रुकते रहे, सोचते रहे और स्वयं को समय देते रहे।

आभार ज्ञापन

इस जीवनी के माध्यम से डॉ. माधव अनुरागी के जीवन-यात्रा को शब्दों में पिरोते समय यह स्पष्ट होता है कि कोई भी मार्ग अकेले तय नहीं होता। हर यात्रा के पीछे कुछ ऐसे लोग होते हैं, जिनका मौन सहयोग, विश्वास और स्नेह व्यक्ति को आगे बढ़ने की शक्ति देता है। यह आभार ज्ञापन उन सभी के प्रति कृतज्ञता का एक सच्चा भाव है, जिनकी उपस्थिति और समर्थन ने डॉ. माधव अनुरागी के जीवन को दिशा दी।

सबसे पहले डॉ. माधव अनुरागी अपने पिताजी वेदपाल के प्रति गहन कृतज्ञता व्यक्त करते हैं, जिनके संस्कार, आध्यात्मिक झुकाव और निरंतर मार्गदर्शन ने उनके जीवन की नींव को मजबूत किया। पिता से मिला अनुशासन, धैर्य और आध्यात्मिक दृष्टि उनके व्यक्तित्व का आधार बनी। इसी क्रम में उनकी माता बबीता देवी के स्नेह, त्याग और मौन सहनशीलता को भी सादर नमन किया जाता है, जिनकी ममता हर कठिन समय में संबल बनकर साथ रही।

इस यात्रा में भैया पंडित कम्मवीर अनुरागी का सहयोग भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा, जिन्होंने मार्गदर्शन, प्रेरणा और आत्मविश्वास देकर हर मोड़ पर साथ निभाया। उनके अनुभव और समर्थन ने अनेक कठिन निर्णयों को सरल बनाया। साथ ही बुआ संगीता देवी का स्नेह और संरक्षण भी इस जीवन-यात्रा का एक सशक्त आधार रहा, जिन्होंने परिवार के रूप में हर स्थिति में संबल दिया।

गुरु श्री अशोक गौड़ जी के प्रति आभार विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिनके मार्गदर्शन और अनुशासन ने साधना और जीवन-दृष्टि को आकार दिया। गुरु का सान्निध्य डॉ. माधव अनुरागी के लिए केवल शिक्षा नहीं, बल्कि जीवन की दिशा बना।

इसके अतिरिक्त, साधना काल में सहयोग देने वाले ग्रामवासी, विशेष रूप से ग्राम प्रधान वीरपाल यादव, डॉ. सुभाष जी, डॉ. मुनीष गौड़, राकेश गौड़ तथा उनके परिवारों के प्रति भी हृदय से धन्यवाद व्यक्त किया जाता है, जिनके सहयोग और सेवा ने कठिन समय को सहज बनाया।

अंततः, उन सभी लोगों के प्रति आभार, जिन्होंने विश्वास किया, साथ दिया और प्रेरणा बने। यह जीवनी उन्हीं सबके सहयोग और विश्वास का प्रतिफल है।

धन्यवाद
डॉ. माधव अनुरागी