डॉ. माधव अनुरागी के जीवन का यह चरण एक ऐसे समय को दर्शाता है, जब बचपन की शांत अनुभूतियाँ अब स्पष्ट प्रश्नों में बदलने लगी थीं। यह वह दौर था, जब उनका मन केवल सीखने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जीवन को समझने की कोशिश करने लगा। यह परिवर्तन अचानक नहीं आया, बल्कि धीरे-धीरे, अनुभवों के साथ गहराता चला गया।
शिक्षा के उद्देश्य से जब डॉ. माधव अनुरागी दिल्ली पहुँचे, तो उनके जीवन का दायरा पहले से कहीं अधिक विस्तृत हो गया। दिल्ली उनके लिए केवल एक शहर नहीं थी, बल्कि एक अलग दुनिया थी—तेज़ रफ्तार, अलग सोच, अलग जीवनशैली और अनगिनत लोग, जिनकी अपनी-अपनी कहानियाँ थीं। यहाँ रहकर उन्होंने पहली बार इतने अलग-अलग स्वभाव, संघर्ष और परिस्थितियाँ एक साथ देखीं। यह सब उनके भीतर पहले से मौजूद संवेदनशीलता को और गहरा कर गया।
वे अपनी पढ़ाई के प्रति जिम्मेदार थे। अध्ययन चलता रहा, दिनचर्या भी बनी रही, लेकिन मन का एक हिस्सा हमेशा कुछ और तलाश करता रहा। उन्हें लगने लगा कि जीवन केवल किताबों में लिखे उत्तरों से नहीं चलता। उनके आसपास लोग थे, जिनके पास सब कुछ होते हुए भी शांति नहीं थी, और कुछ ऐसे भी थे जिनके पास बहुत कम था, फिर भी उनके चेहरे पर संतोष झलकता था। इन विरोधाभासों ने डॉ. माधव अनुरागी को सोचने पर मजबूर किया।
दिल्ली में रहते हुए उन्होंने लोगों की बातें ध्यान से सुनीं। वे केवल शब्द नहीं सुनते थे, बल्कि उनके पीछे छिपे भावों को महसूस करते थे। किसी की परेशानी, किसी की उलझन, किसी की बेचैनी—इन सबका उन पर गहरा प्रभाव पड़ता था। यही वह समय था जब उनके भीतर यह सवाल स्पष्ट रूप से उभरने लगा कि क्या किसी व्यक्ति के जीवन को गहराई से समझने का कोई मार्ग है? क्या किसी के वर्तमान संघर्ष को उसके अतीत और भविष्य से जोड़कर देखा जा सकता है?
इन्हीं प्रश्नों ने उन्हें ज्योतिष विद्या की ओर धीरे-धीरे आकर्षित किया। यह आकर्षण किसी चमत्कार या दिखावे से नहीं, बल्कि समझने की इच्छा से जुड़ा था। वे यह जानना चाहते थे कि जीवन में जो कुछ घटता है, उसका कोई क्रम, कोई संकेत, कोई कारण होता है या नहीं। यह जानने की चाह केवल अपने लिए नहीं थी, बल्कि दूसरों की समस्याओं को समझने और उन्हें सही दिशा दिखाने की इच्छा से भी जुड़ी हुई थी।
इसी खोज के क्रम में उनकी भेंट उनके गुरु श्री अशोक गौड़ जी से हुई। यह मुलाकात उनके लिए केवल एक शिक्षक से मिलने जैसी नहीं थी, बल्कि जीवन को देखने का एक नया दृष्टिकोण पाने जैसी थी। डॉ. माधव अनुरागी ने गुरु के सामने अपनी जिज्ञासा और मन की बात रखी।