इतिहास किसी भी समाज की आत्मा होता है। वह हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है और हमारी पहचान को दृढ़ करता है। हर युग में कुछ ऐसे लोग हुए हैं जिन्होंने अपने प्रयासों से उस इतिहास को सुरक्षित रखा, संरक्षित किया और नई पीढ़ी तक पहुँचाने का कार्य किया। ग़ाज़ीपुर जैसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर से सम्पन्न ज़िले में यह भूमिका निभाई है डॉ. नसीम ने। वे न केवल एक संग्रहकर्ता (Collector) हैं, बल्कि एक इतिहासकार, लेखक, शोधकर्मी और समाजसेवी भी हैं। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि अगर इच्छाशक्ति मजबूत हो, तो सीमित संसाधनों के बावजूद भी समाज और राष्ट्र के लिए अविस्मरणीय योगदान दिया जा सकता है।
डॉ. नसीम का जन्म और पालन-पोषण ग़ाज़ीपुर ज़िले में हुआ। वे साधारण परिवार से थे, लेकिन उनके भीतर इतिहास और संस्कृति को जानने की प्रबल जिज्ञासा बचपन से ही मौजूद थी। उनके दादा, परदादा और अन्य पूर्वजों का जीवन उनके लिए प्रेरणा का स्रोत रहा। वे मानते थे कि परिवार की स्मृतियाँ, रिश्ते-नाते और परंपराएँ केवल मौखिक नहीं रहनी चाहिए, बल्कि दस्तावेज़ों और प्रमाणों के रूप में संरक्षित होनी चाहिए। यही सोच धीरे-धीरे उनके जीवन का आधार बनी।
उनकी असली प्रेरणा 2004 में कोलकाता संग्रहालय की यात्रा से मिली। वहाँ उन्होंने ऐसे पुराने और दुर्लभ सिक्के देखे, जिन्हें उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था। दस, पचास और सौ के सिक्कों की ऐतिहासिकता ने उनके भीतर एक नया जज़्बा भर दिया। उन्हें लगा कि अगर कोलकाता जैसे शहर में इतनी धरोहरें सुरक्षित हो सकती हैं तो ग़ाज़ीपुर जैसे ऐतिहासिक ज़िले में क्यों नहीं। इस प्रश्न ने ही उनके जीवन की दिशा तय कर दी।
डॉ. नसीम ने अपने पड़ोसियों, रिश्तेदारों और परिचितों से पुराने सिक्के माँगना शुरू किया। धीरे-धीरे उनका संग्रह बढ़ता गया। एक दिन उन्होंने महसूस किया कि यह शौक अब केवल निजी संतोष का साधन नहीं, बल्कि समाज के लिए भी उपयोगी बन सकता है। यहीं से उन्होंने संग्रहालय स्थापित करने का संकल्प लिया।
आज उनके पास लगभग ढाई हज़ार सिक्कों का संग्रह है। इसमें कौड़ी से लेकर क्रेडिट कार्ड तक की यात्रा दर्ज है। अलग-अलग शासनकालों, अलग-अलग सन् और अलग-अलग शासकों के सिक्के उनके संग्रह में शामिल हैं। ये केवल धातु के टुकड़े नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक और सांस्कृतिक यात्रा के साक्ष्य हैं।
उनका दूसरा बड़ा संग्रह है निमंत्रण पत्रों का। विवाह, सामाजिक अवसर, धार्मिक आयोजन—हर तरह के निमंत्रण पत्र उनके पास सुरक्षित हैं। इनमें महारानी लक्ष्मीबाई का विवाह-निमंत्रण भी है, भूटान नरेश का आमंत्रण भी, और ग़ाज़ीपुर के स्थानीय ज़मींदारों के पत्र भी। कुछ निमंत्रण पत्र लकड़ी पर उकेरे गए हैं, जिनमें मेवे और मिठाइयाँ भरकर भेजी जाती थीं। इन पत्रों से न केवल दो परिवारों के मिलन की कहानी झलकती है, बल्कि स्थानीय संस्कृति, गीत, शायरी और सामाजिक रीतियों का भी पता चलता है।
उनके संग्रह में चार पीढ़ियों—दादा, पिता, पुत्र और पौत्र के निमंत्रण पत्र मौजूद हैं। लगभग साढ़े छह हज़ार निमंत्रण पत्र उनके पास हैं, जिनमें से कुछ हस्तलिखित और दुर्लभ हैं।
डॉ नसीम का जीवन उस धरोहर और परंपरा का सजीव उदाहरण है, जो पीढ़ियों से अर्जित मूल्यों और अनुभवों पर आधारित है। उनका जीवन न केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों का दर्पण है, बल्कि पारिवारिक संस्कारों, सामाजिक चेतना और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का भी साक्षी है।
डॉ. नसीम का जन्म उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर ज़िले के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ। वे अपने माता–पिता के इकलौते पुत्र हैं और उनकी तीन बड़ी बहनें हैं। उनका परिवार लंबे समय से शिक्षा, अनुशासन और सामाजिक मूल्यों को प्राथमिकता देता आया है।
उनके पिता एक आदर्श शिक्षक रहे हैं। वे हेडमास्टर के पद से सेवानिवृत्त हुए। एक शिक्षक के रूप में वे न केवल विद्यार्थियों को पढ़ाते थे, बल्कि उन्हें जीवन जीने का ढंग भी सिखाते थे। समय के प्रति उनकी सजगता, अनुशासनप्रियता और हर कार्य को व्यवस्थित रूप से करने की आदत ने परिवार के हर सदस्य पर गहरा प्रभाव डाला। वे समय से हर काम करना, हर वस्तु को सही ढंग से रखना और किसी भी कार्य को करने से पहले उससे जुड़ी एक–एक बारीकियों को स्पष्ट रूप से समझाना अपनी दिनचर्या का हिस्सा मानते थे। इन्हीं गुणों के चलते डॉ. नसीम और उनकी बहनों के व्यक्तित्व का भी विस्तार हुआ ।
डॉ. नसीम के दादा, हाजी मोहम्मद शम्सुद्दीन ख़ान, उस दौर में शिक्षण और सामाजिक उत्थान के लिए जाने जाते थे जब ग़ाज़ीपुर क्षेत्र में शिक्षा की कोई ठोस व्यवस्था मौजूद नहीं थी। उस समय गांवों में स्कूलों का अभाव था और शिक्षा लोगों के लिए किसी विलासिता से कम नहीं थी। लेकिन हाजी मोहम्मद शम्सुद्दीन ख़ान ने समाज में शिक्षा की अलख जगाने का कार्य किया।
उनकी दूरदृष्टि और परिश्रम के कारण ही क्षेत्र में धीरे–धीरे शिक्षा का वातावरण तैयार हुआ। यह उनका ही योगदान था कि आज उनके परिवार में शिक्षा और ज्ञान की परंपरा इतनी सशक्त है।
यदि डॉ. नसीम के वंशवृक्ष पर नज़र डालें तो यह गौरव और इतिहास से भरा हुआ है। उनके पुरखों का इतिहास मुग़ल काल तक जाता है। औरंगज़ेब के शासनकाल में उनके दसवीं पीढ़ी ऊपर के पूर्वज कुंवर नवल सिंह थे। उन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार किया और उनका नया नाम रखा गया – मोहम्मद दीनदार ख़ान।
मोहम्मद दीनदार ख़ान ने ही उस गांव की नींव रखी जिसका नाम आज भी उनके नाम पर है। उन्होंने न केवल गांव बसाया, बल्कि सामाजिक संगठन और सामूहिक जीवन के लिए आदर्श भी प्रस्तुत किया। यही कारण है कि उस गांव का नाम इतिहास में दर्ज हुआ और आज भी गर्व के साथ लिया जाता है।
सन 2004 की एक सुबह, डॉ. नसीम पहली बार कोलकाता के मशहूर इंडियन म्यूज़ियम पहुँचे। उनके मन में उत्सुकता थी कि यहाँ क्या मिलेगा — पुरानी धरोहर, इतिहास की निशानियाँ या फिर केवल किताबों में पढ़े हुए तथ्य। लेकिन जब वे अंदर दाख़िल हुए, तो उन्हें मानो लगा कि वे किसी दूसरी दुनिया में पहुँच गए हैं।
दीवारों पर टंगी पेंटिंग्स, काँच के बक्सों में सुरक्षित सिक्के, प्राचीन मूर्तियाँ और पीली पड़ चुकी पांडुलिपियाँ — हर चीज़ उन्हें अतीत से जोड़ रही थी। उनकी नज़र सबसे पहले सिक्कों पर पड़ी। वहाँ 10 के सिक्के थे, 50 के सिक्के थे, 100 के भी सिक्के प्रदर्शित थे, जिनके बारे में उन्होंने कभी सिर्फ किताबों में सुना था लेकिन देखना उनके लिए अनोखा अनुभव था।
उनका मन जैसे ठहर गया। उन्होंने हर सिक्के को ध्यान से देखा, उसके पीछे की कहानी जानी। यह केवल धातु का टुकड़ा नहीं था, बल्कि समय का गवाह था।
फिर उनकी नज़र उन प्राचीन मूर्तियों और दस्तावेज़ों पर पड़ी जो सदियों पुराने थे। उन सबको देखकर उनके मन में एक गहरी भावना उठी — “अगर कोलकाता में इतना बड़ा संग्रहालय हो सकता है, तो ग़ाज़ीपुर जैसे ऐतिहासिक ज़िले में क्यों नहीं?”
यहीं से उनके जीवन की नई यात्रा शुरू हुई — संग्रह से संग्रहालय तक की यात्रा।
कोलकाता से लौटने के बाद, डॉ. नसीम के मन में यह विचार लगातार घूमता रहा। उन्होंने ठान लिया कि ग़ाज़ीपुर की धरोहर को भी संरक्षित करना है। लेकिन शुरुआत आसान नहीं थी। न धन था, न सरकारी सहयोग। केवल एक शौक था और उस शौक को ज़िम्मेदारी में बदलने का संकल्प।
उन्होंने सबसे पहले अपने ही घर से शुरुआत की। अपने पिताजी, रिश्तेदारों और पड़ोसियों से पूछा — “क्या आपके पास पुराने सिक्के, दस्तावेज़ या वस्तुएँ हैं जिन्हें आप सँभालकर नहीं रख पाए?” धीरे–धीरे उनके पास पुराने सिक्कों का छोटा–सा संग्रह इकट्ठा होने लगा।
यह संग्रह किसी खेल या दिखावे का हिस्सा नहीं था, बल्कि एक गंभीर प्रयास था। वे मानते थे कि इतिहास केवल किताबों में पढ़ने की चीज़ नहीं है, बल्कि उसे छूकर, देखकर और समझकर ही जिया जा सकता है।
इतिहास का मूल्य तब और बढ़ जाता है जब वह केवल पुस्तकों तक सीमित न रहकर जीवित प्रमाणों के रूप में हमारे सामने आए। डॉ. नसीम का जीवन इसी दृष्टिकोण का प्रतीक है। उनका हर संग्रह अतीत की कोई न कोई परत खोलता है, कोई भूली हुई कहानी सुनाता है और हमें हमारी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ता है। उनके संग्रहों की विविधता और गहराई इतनी अद्भुत है कि यह न केवल व्यक्तिगत रुचि का परिचायक है, बल्कि एक अकादमिक धरोहर भी है।
डॉ. नसीम की पहचान का एक महत्वपूर्ण पहलू उनके सिक्कों का विशाल संग्रह है। जब उन्होंने 2004 में कोलकाता म्यूज़ियम का दौरा किया, तो वहाँ देखे गए प्राचीन सिक्कों ने उनके मन में एक गहरी छाप छोड़ी। उन्होंने दस, पचास और सौ के सिक्के पहली बार देखे थे। यह अनुभव इतना प्रभावी था कि उन्होंने ठान लिया कि वे भी सिक्कों का संग्रह करेंगे।
समय के साथ उनका यह संग्रह बढ़ता गया। लोग उनके शौक को देखकर उन्हें अपने पास के पुराने सिक्के भेंट करने लगे। आज उनके पास लगभग ढाई हज़ार सिक्कों का भंडार है। इसमें कौड़ी से लेकर आधुनिक क्रेडिट कार्ड तक की विकास यात्रा दर्ज है।
यह संग्रह केवल धातु के टुकड़ों का ढेर नहीं है, बल्कि यह मुद्रा–विकास का जीवंत इतिहास है। इसमें प्राचीन काल के सिक्कों से लेकर आधुनिक दौर की नोट–मुद्रा व्यवस्था की झलक मिलती है। शोधार्थियों और विद्यार्थियों के लिए यह संग्रह अमूल्य धरोहर है।
डॉ. नसीम के सबसे अनोखे संग्रहों में विवाह निमंत्रण पत्रों का संग्रह शामिल है। आमतौर पर लोग विवाह कार्ड को समारोह के बाद फेंक देते हैं, लेकिन डॉ. नसीम ने इसे इतिहास का एक स्रोत मानकर सहेजना शुरू किया।
आज उनके पास लगभग 6000 निमंत्रण पत्रों का संग्रह है। इसमें उनके दादा का 1905 का विवाह निमंत्रण पत्र भी शामिल है। यह पत्र हस्तलिखित है और उस पर रिश्तेदारों के नाम व हस्ताक्षर दर्ज हैं। यह 120 वर्ष पुराना दस्तावेज़ केवल विवाह का निमंत्रण नहीं बल्कि पूरे परिवार की पीढ़ियों का वृत्तांत है।
उनके संग्रह में विभिन्न शैलियों के निमंत्रण पत्र मौजूद हैं। कुछ स्थानीय ज़मींदारों के लकड़ी के कार्ड हैं, जिन्हें मेवा और मिठाई के डिब्बों के साथ भेजा जाता था। कुछ कार्डों पर उर्दू शायरी अंकित है, कहीं लोकगीत दर्ज हैं, तो कहीं सांस्कृतिक प्रतीकों का चित्रण मिलता है।
डॉ नसीम अपने जीवन की इस लंबी और कठिन, किंतु संतोषजनक यात्रा के अवसर पर उन सभी का हृदय से धन्यवाद प्रकट करते हैं, जिन्होंने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उनके कार्यों को गति प्रदान की। उनका मानना है कि व्यक्तिगत प्रयास केवल तब सफल होते हैं, जब समाज और परिवार का सहयोग साथ हो।
सबसे पहले वे अपने माता–पिता और परिवार के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। उन्हीं के संस्कारों ने डॉ. नसीम को धैर्य, सत्यनिष्ठा और ईमानदारी का मार्ग दिखाया। परिवार ने हर कठिन घड़ी में संबल प्रदान किया और यही संबल उनके लिए सबसे बड़ी पूँजी रहा।
अपने शिक्षकों और गुरुओं के प्रति भी वे गहन आभार प्रकट करते हैं, जिनकी प्रेरणा से उनमें इतिहास और संस्कृति के प्रति गहरी जिज्ञासा जागृत हुई। यही प्रेरणा उन्हें संग्रहालय निर्माण और धरोहर संरक्षण की दिशा में आगे बढ़ाती रही।
डॉ. नसीम अपने मित्रों और शुभचिंतकों का भी विशेष धन्यवाद करते हैं। जब संग्रहालय की स्थापना और संग्रहों के संरक्षण में संसाधनों की कमी हुई, जब मार्ग कठिन और अनिश्चित दिखा, तब इन्हीं लोगों का प्रोत्साहन उन्हें नई ऊर्जा देता रहा।
वे उन अनगिनत साधारण नागरिकों का भी हार्दिक आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होंने उन पर विश्वास किया और अपनी पीढ़ियों से सुरक्षित धरोहरें—सिक्के, निमंत्रण पत्र, पांडुलिपियाँ और अन्य वस्तुएँ—उनके हवाले कर दीं। उनके सहयोग ने ही इस संग्रह को व्यक्तिगत शौक से समाज की धरोहर में बदल दिया।
इतिहासकारों, साहित्यकारों और शोध संस्थानों का भी वे धन्यवाद करते हैं, जिन्होंने उनके लेखन और शोध को मान्यता दी तथा उनकी पुस्तकों के प्रकाशन को संभव बनाया। इस मान्यता ने उन्हें यह विश्वास दिलाया कि उनके प्रयास केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय महत्व के हैं।
डॉ. नसीम मानते हैं कि यह संग्रहालय और यह साहित्य आने वाली पीढ़ियों की अमानत है। यदि उनके प्रयासों से नई पीढ़ी में इतिहास और संस्कृति के प्रति सम्मान जागृत होता है, तो यही उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।
अंत में, वे सम्पूर्ण समाज और अपने क्षेत्र के लोगों को धन्यवाद प्रकट करते हैं। उनके अनुसार, यह संग्रहालय, यह धरोहर और यह सेवा केवल उनकी नहीं, बल्कि हम सबकी सामूहिक संपत्ति है।
सादर धन्यवाद।
डॉ. कुँवर मोहम्मद नसीम रज़ा सिकरवार