“एक ऐसे व्यक्ति का नाम, जिसने अपने संघर्ष को समाज की सेवा में बदल दिया, और जो हमेशा कमजोरों, वंचितों तथा अधिकारों से वंचित लोगों के पक्ष में खड़ा रहा।”

परिचय

डॉ. रमेश बाबूराव गायकवाड का जीवन उस संघर्षशील यात्रा का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें साधारण परिस्थितियों से उठकर समाज के लिए असाधारण रूप से खड़े होने का साहस दिखाई देता है। उनका जन्म 17 मार्च 1971 को हुआ। उनके पिता बाबूराव नामदेव गायकवाड और माता सीता बाबूराव गायकवाड ने कठिन परिस्थितियों में भी उन्हें जीवन से हार न मानने की सीख दी। वे महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र और लातूर जिले से जुड़े किसान परिवार की पृष्ठभूमि से आते हैं। बचपन में जब वे लगभग चार या पांच वर्ष के थे, तब उनके माता पिता उन्हें मुंबई लेकर आए। एक साधारण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से आने के कारण जीवन के प्रारंभिक दिनों में ही उन्होंने अभाव, मेहनत और जिम्मेदारी को बहुत करीब से महसूस किया ।

मुंबई ने उन्हें केवल रहने की जगह नहीं दी, बल्कि जीवन की वास्तविकताओं से परिचित कराया। बचपन में उन्होंने देखा कि गरीब परिवारों के लिए रोजमर्रा का जीवन भी कितना कठिन होता है। परिवार में कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं थी, कोई सरकारी सेवा में नहीं था और न ही आर्थिक रूप से कोई मजबूत सहारा था । इसके बावजूद उन्होंने अपने भीतर यह भावना विकसित की कि समाज के लिए कुछ करना चाहिए। यही भावना धीरे धीरे उनके जीवन का आधार बनती गई ।

उनकी शिक्षा भी संघर्षों के बीच आगे बढ़ी। उन्होंने मुंबई में पढ़ाई की और बाद में कुछ समय के लिए गांव तथा हॉस्टल जीवन का अनुभव भी किया। हॉस्टल में रहते हुए उन्होंने व्यवस्था की कमियों को बहुत नजदीक से देखा। भोजन की खराब स्थिति, विद्यार्थियों की बीमारी, देखभाल का अभाव और जिम्मेदार लोगों की उपेक्षा ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला। कम उम्र में ही उन्हें यह समझ आने लगा कि अन्याय केवल बड़े मंचों पर नहीं होता, वह छोटे कमरों, छात्रावासों, गरीब परिवारों और रोजमर्रा की चुप्पियों में भी मौजूद रहता है । यही अनुभव उनके भीतर नेतृत्व और प्रतिरोध की पहली चेतना लेकर आया ।

आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उन्हें जीवन में जल्दी जिम्मेदारियां संभालनी पड़ीं। उन्होंने कम उम्र में श्रम किया, रेत के ट्रक पर काम किया, लंबी दूरी पैदल तय की और कठिन परिस्थितियों में भी परिवार का साथ निभाया। बाद में उन्हें महानगरपालिका से लाइसेंस मिला और उन्होंने क्लियरिंग एजेंट के रूप में काम किया। इस काम ने उन्हें आत्मनिर्भरता दी और परिवार को संभालने का अवसर भी दिया। उनके जीवन का यह पक्ष बताता है कि उन्होंने केवल संघर्षों की बातें नहीं कीं, बल्कि उन्हें स्वयं जिया और उन्हीं अनुभवों से अपने व्यक्तित्व को मजबूत बनाया।

उनकी सामाजिक चेतना बहुत कम उम्र में ही जाग चुकी थी। पंद्रह सोलह वर्ष की आयु से वे सामाजिक और राजनीतिक कार्यों से जुड़ने लगे। भारतीय दलित पैंथर आंदोलन के माध्यम से उन्होंने दलितों पर अत्याचार, महिलाओं पर अन्याय, जातिवाद, महंगाई और सामाजिक असमानता जैसे विषयों पर आवाज उठाई। यह वह समय था जब उन्होंने समझा कि समाज में बदलाव लाने के लिए केवल दुख महसूस करना पर्याप्त नहीं है, उसके लिए संगठित होकर खड़ा होना भी जरूरी है।

आगे चलकर वे रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया से जुड़े और रामदास आठवले के नेतृत्व में सामाजिक और राजनीतिक कार्यों को आगे बढ़ाया। उन्हें बोरीवली तालुका स्तर पर संगठनात्मक जिम्मेदारी मिली और उन्होंने पार्टी के माध्यम से जनता के मुद्दों पर काम करना शुरू किया। वे ऐसे परिवार से आते थे जहां कोई स्थापित राजनीतिक आधार नहीं था, इसलिए उनकी पहचान किसी विरासत से नहीं, बल्कि संघर्ष, सक्रियता और लोगों के विश्वास से बनी।

“कभी-कभी जीवन की सबसे बड़ी शुरुआत किसी सुविधा से नहीं, बल्कि उस मिट्टी से होती है जहाँ संघर्ष इंसान को भीतर से मजबूत बनाना शुरू करता है।”

Phase 1: मराठवाड़ा की मिट्टी से मुंबई की राह तक

डॉ. रमेश बाबूराव गायकवाड की जीवन यात्रा एक ऐसे साधारण घर से शुरू होती है, जहां जीवन की चमक सुविधाओं से नहीं, बल्कि मेहनत, धैर्य और आत्मसम्मान से बनी थी। उनका जन्म 17 मार्च 1971 को हुआ। वे महाराष्ट्र की उस धरती से जुड़े हैं, जहां गांवों की सादगी, खेतों की मेहनत और परिवारों की सामूहिक जिम्मेदारियां जीवन का स्वाभाविक हिस्सा होती हैं। उनका मूल संबंध महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र से है, और मराठवाड़ा में स्थित लातूर जिले से उनकी पारिवारिक जड़ें जुड़ी हुई हैं। यही वह पृष्ठभूमि थी, जिसने उनके भीतर जीवन को जमीन से समझने की दृष्टि पैदा की।

उनके पिता बाबूराव नामदेव गायकवाड और माता सीता बाबूराव गायकवाड एक साधारण किसान परिवार से थे। परिवार के पास बड़ी संपत्ति, राजनीतिक विरासत या कोई विशेष सामाजिक सुविधा नहीं थी। जीवन मेहनत से चलता था और हर छोटी आवश्यकता के पीछे परिश्रम की लंबी कहानी होती थी। ऐसे वातावरण में जन्म लेने वाले बच्चे बहुत जल्दी समझ जाते हैं कि जीवन केवल इच्छाओं से नहीं, बल्कि सहनशीलता और श्रम से बनता है। उनके जीवन में भी यही सत्य बहुत जल्दी उतर गया।

उनका बचपन किसी आरामदायक सुविधा से भरा हुआ नहीं था। घर की परिस्थिति सामान्य नहीं, बल्कि कठिन थी। वे स्वयं अपने जीवन को याद करते हुए यह स्वीकार करते हैं कि वे एक गरीब परिवार से आए। इस स्वीकार में शिकायत नहीं थी, बल्कि अपने अतीत को सम्मान से देखने की विनम्रता थी। किसी व्यक्ति के लिए अपने संघर्ष को स्वीकार करना आसान नहीं होता, लेकिन उनके भीतर अपनी जड़ों के प्रति एक स्पष्ट गर्व दिखाई देता है। उन्हें यह एहसास रहा कि जिस मिट्टी ने उन्हें जन्म दिया, उसी ने उन्हें जीवन की सच्ची मजबूती भी दी।

जब वे लगभग चार या पांच वर्ष के थे, तब उनके माता पिता उन्हें मुंबई लेकर आए। यह केवल एक स्थान परिवर्तन नहीं था, बल्कि एक ऐसे परिवार की नई शुरुआत थी, जो जीवन की बेहतर संभावना तलाश रहा था। गांव से शहर की यात्रा अपने साथ अनेक उम्मीदें लाती है, लेकिन उसके साथ उतनी ही कठिनाइयां भी जुड़ी होती हैं। मुंबई जैसे बड़े शहर में आना उन परिवारों के लिए आसान नहीं होता, जिनके पास स्थायी आर्थिक आधार न हो। फिर भी उनके माता पिता ने यह कदम उठाया, क्योंकि वे अपने बच्चों के लिए जीवन में आगे बढ़ने का रास्ता बनाना चाहते थे।

मुंबई ने उन्हें एक अलग दुनिया दिखाई। गांव की जमीन से उठकर शहर की भीड़, भागदौड़ और संघर्षों के बीच जीना अपने आप में एक बड़ा अनुभव था। यहां जीवन तेज था, अवसर थे, लेकिन उन अवसरों तक पहुंचना सरल नहीं था। परिवार को रोजमर्रा की जरूरतों के लिए मेहनत करनी पड़ती थी। घर में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जो पहले से राजनीति में स्थापित हो, कोई सरकारी सेवा में न था, और परिवार धनवान भी नहीं था। इसलिए जो भी कुछ बनना था, वह अपने बल, मेहनत और लोगों के विश्वास से ही बनना था।

इस प्रारंभिक स्थिति ने डॉ. रमेश बाबूराव गायकवाड को भीतर से गहराई दी। उन्होंने बचपन से देखा कि गरीब परिवार किस तरह अपना जीवन चलाते हैं, कैसे शहर में टिके रहने के लिए छोटी से छोटी जरूरत भी संघर्ष बन जाती है, और कैसे मेहनतकश लोगों का जीवन अक्सर दूसरों की नजरों से छिपा रह जाता है। यही देखने और महसूस करने की क्षमता आगे चलकर उनके सामाजिक व्यक्तित्व का आधार बनी। उनका मन उन लोगों के साथ सहज रूप से जुड़ता गया, जो कठिन परिस्थितियों में जीते थे, क्योंकि उन्होंने स्वयं ऐसी परिस्थितियों को बहुत करीब से जाना था।

“कभी-कभी बचपन की छोटी-सी चोट मनुष्य को जीवन भर के लिए संवेदनशील बना देती है, और वही संवेदनशीलता आगे चलकर समाज की आवाज़ बन जाती है।”

Phase 2 : शिक्षा, हॉस्टल जीवन और अन्याय से पहला सामना

डॉ. रमेश बाबूराव गायकवाड के जीवन में शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं रही। उनके लिए शिक्षा का अर्थ विद्यालय की कक्षाओं, पाठ्यपुस्तकों और परीक्षाओं से आगे बढ़कर जीवन को समझना भी था। बचपन से ही उन्होंने ऐसे अनुभव देखे, जिन्होंने उन्हें बहुत जल्दी यह एहसास करा दिया कि समाज में व्यवस्था, अधिकार और न्याय का प्रश्न कितना महत्वपूर्ण है। उनके विद्यार्थी जीवन ने उन्हें केवल पढ़ना नहीं सिखाया, बल्कि अन्याय को पहचानना और उसके सामने खड़े होना भी सिखाया।

उन्होंने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई मुंबई में की। शहर का वातावरण उनके लिए नया भी था और चुनौतीपूर्ण भी। यहां जीवन अपने ढंग से तेज था, लेकिन एक विद्यार्थी के रूप में वे धीरे धीरे उस दुनिया को समझ रहे थे, जहां हर परिवार अपनी स्थिति के अनुसार संघर्ष करता था। पढ़ाई के दिनों में ही उनके भीतर लोगों से जुड़ने, आसपास की परिस्थितियों को देखने और गलत बात पर चुप न रहने की प्रवृत्ति दिखाई देने लगी थी। यह कोई अचानक बनी हुई आदत नहीं थी, बल्कि उनके घर, समाज और आसपास के माहौल से धीरे धीरे तैयार हुई चेतना थी ।

कुछ समय बाद उन्हें आगे की पढ़ाई के लिए गांव की ओर भेजा गया। वहां उन्हें हॉस्टल में रहकर पढ़ाई करनी पड़ी। यह जीवन उनके लिए बहुत आसान नहीं था। विद्यार्थी अवस्था में घर से दूर रहना अपने आप में कठिन होता है, और जब उस दूरी के साथ सुविधाओं की कमी जुड़ जाए, तो बच्चा उम्र से पहले बड़ा होने लगता है। उनके साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। हॉस्टल में रहते हुए उन्होंने जो देखा, वह उनके मन में बहुत गहराई से बैठ गया।

हॉस्टल की व्यवस्था कमजोर थी। भोजन की स्थिति ठीक नहीं थी। जब दाल बनती थी, तो उसमें दाल ढूंढनी पड़ती थी, क्योंकि वह लगभग पानी जैसी होती थी। रोटियां ‘भी ठीक से नहीं बनती थीं। वहां काम करने वाली महिलाओं को समय पर भुगतान नहीं मिलता था, इसलिए वे भी मजबूरी में जैसे तैसे काम पूरा करके चली जाती थीं। यह परिस्थिति केवल असुविधा नहीं थी, बल्कि उन विद्यार्थियों की सेहत और सम्मान से जुड़ा विषय था, जो अपने परिवारों से दूर रहकर भविष्य बनाने की कोशिश कर रहे थे ।

उस समय वे बहुत छोटे थे, लगभग तेरह चौदह वर्ष की उम्र के आसपास। इतनी कम उम्र में अधिकतर बच्चे अपनी पढ़ाई, खेल और निजी सपनों तक सीमित रहते हैं, लेकिन उन्होंने हॉस्टल के भीतर एक ऐसी स्थिति देखी, जिसने उनके मन को झकझोर दिया। भोजन की खराब गुणवत्ता और सफाई की कमी के कारण कई विद्यार्थी बीमार पड़ने लगे। कुछ बच्चों को बुखार आने लगा। कई विद्यार्थी दूर दूर के गांवों से आए थे। उनके माता पिता तुरंत पहुंच नहीं सकते थे। ऐसे में बच्चों की बीमारी केवल शारीरिक परेशानी नहीं थी, बल्कि असहायता का अनुभव भी थी।

सबसे अधिक पीड़ा उन्हें इस बात से हुई कि कोई जिम्मेदार व्यक्ति यह देखने नहीं आया कि बच्चों को भोजन मिल रहा है या नहीं, वे बीमार क्यों पड़ रहे हैं, और उनकी देखभाल कौन कर रहा है। यह उपेक्षा उनके मन में बहुत गहराई से उतरी। एक किशोर विद्यार्थी के रूप में उन्होंने महसूस किया कि जब व्यवस्था चुप हो जाती है, तब किसी को आवाज उठानी पड़ती है। यह उनके जीवन का वह मोड़ था, जहां भीतर छिपी नेतृत्व क्षमता पहली बार स्पष्ट रूप में सामने आने लगी

उन्होंने अपने साथियों से बात की। वे स्वयं भी उसी समस्या का हिस्सा थे, लेकिन उन्होंने केवल अपनी असुविधा नहीं देखी। उन्होंने बाकी विद्यार्थियों की हालत भी देखी। रात के समय, जब कई बच्चे बीमार थे और कोई उन्हें देखने वाला नहीं था, तब उन्होंने एक साहसिक कदम उठाया। उन्होंने लगभग सौ डेढ़ सौ विद्यार्थियों को साथ लिया और खराब भोजन को भी साथ लेकर तहसील कार्यालय की ओर गए। यह घटना किसी बड़े राजनीतिक मंच की नहीं थी, परंतु यह उनके भीतर के सामाजिक कार्यकर्ता की पहली पहचान थी।

“जिस उम्र में बच्चे सहारे ढूँढ़ते हैं, उसी उम्र में कुछ लोग जिम्मेदारियों को अपना सहारा बना लेते हैं।”

Phase 3 : कम उम्र की जिम्मेदारियाँ और परिवार संभालने का संघर्ष


डॉ. रमेश बाबूराव गायकवाड के जीवन का तीसरा चरण उस कठिन दौर को सामने लाता है, जहां बचपन और युवावस्था के बीच की दूरी बहुत जल्दी समाप्त हो गई। जीवन ने उन्हें धीरे धीरे नहीं, बल्कि सीधे संघर्षों के बीच खड़ा किया। परिस्थितियां ऐसी थीं कि उन्हें कम उम्र में ही यह समझना पड़ा कि परिवार, पढ़ाई, काम और आत्मसम्मान को साथ लेकर चलना क्या होता है। उनके जीवन की यह अवस्था केवल आर्थिक संघर्ष की कहानी नहीं है, बल्कि उस आत्मनिर्भरता की शुरुआत है, जिसने आगे चलकर उनके व्यक्तित्व को जनसेवा के लिए तैयार किया।

वे ऐसे परिवार से आते थे जहां सुविधाएं सीमित थीं और जरूरतें मेहनत से पूरी होती थीं। परिवार की स्थिति ने उन्हें बहुत जल्दी जिम्मेदारी का अर्थ समझा दिया। उनके लिए जीवन केवल पढ़ाई करके आगे बढ़ने का सीधा रास्ता नहीं था। बीच में अभाव थे, रोजमर्रा की आवश्यकताएं थीं, परिवार की चिंता थी और खुद को संभालने का दबाव भी था। यही वह समय था जब उन्होंने जाना कि संघर्ष कोई अलग घटना नहीं होता, बल्कि कभी कभी वही जीवन की रोज की भाषा बन जाता है।

उनकी पढ़ाई के दिनों में आर्थिक कठिनाइयां लगातार साथ रहीं। गांव और शहर के बीच का जीवन, परिवार की सीमित स्थिति और साधनों की कमी ने उन्हें बार बार परखा। कई बार बस से जाने के लिए भी पैसे नहीं होते थे। ऐसे में वे अपने गांव से कई किलोमीटर पैदल चलते थे। बारिश हो या धूप, रास्ता आसान हो या कठिन, जाना जरूरी होता था। उन्होंने अपने साथियों के साथ लंबी दूरी पैदल तय की। यह केवल सफर नहीं था, बल्कि हर दिन की वह परीक्षा थी, जिसमें शरीर थकता था, पर मन हारना नहीं सीखता था।

ऐसे अनुभवों ने उन्हें जीवन की कठोरता से बहुत जल्दी परिचित कराया। जब कोई विद्यार्थी रोज कई किलोमीटर पैदल चलकर पढ़ाई की दिशा में आगे बढ़ता है, तब उसके भीतर केवल शिक्षा की इच्छा नहीं होती, बल्कि जीवन को बदलने की चुपचाप जिद भी होती है। उनके भीतर भी यही जिद थी। साधन न होने के बावजूद वे चलते रहे। आज उनकी यात्रा को देखते समय यह समझना आवश्यक है कि उनके व्यक्तित्व की मजबूती किसी सुविधा से पैदा नहीं हुई, बल्कि उन्हीं रास्तों से बनी, जिन पर वे पैसे के अभाव में पैदल चले।

कम उम्र में श्रम करना भी उनके जीवन का हिस्सा बना । लगभग सत्रह वर्ष की उम्र में उन्होंने रेत के ट्रक पर काम किया। सुबह से रात तक मेहनत, भरे हुए ट्रक को खाली करना और शारीरिक श्रम के बीच अपनी पढ़ाई और जीवन को आगे बढ़ाना आसान नहीं था । इस काम में थकान थी, जोखिम था और संघर्ष की सीधी अनुभूति थी। परंतु उन्होंने इसे शर्म या बोझ की तरह नहीं देखा। उन्होंने मेहनत को जीवन का साधन माना और उसी से अपने भीतर आत्मविश्वास पैदा किया।

उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि मेहनत करने वाला व्यक्ति परिस्थितियों से छोटा नहीं होता। जिस उम्र में कई युवा जीवन के सपनों को शब्द देते हैं, उस उम्र में वे श्रम की जमीन पर खड़े होकर अपने भविष्य को आकार दे रहे थे। रेत के ट्रक पर किया गया काम उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण अनुभव था, क्योंकि उसने उन्हें मजदूर जीवन की वास्तविकता भी समझाई। आगे चलकर जब उन्होंने मजदूरों, सफाई कर्मचारियों और कमजोर वर्गों के अधिकारों की बात की, तो उसके पीछे केवल विचार नहीं थे, बल्कि श्रम को स्वयं जीने का अनुभव भी था

आभार


डॉ. रमेश बाबूराव गायकवाड की यह जीवन यात्रा उन सभी संबंधों, विचारों और अनुभवों के प्रति गहरी कृतज्ञता व्यक्त करती है, जिन्होंने उनके व्यक्तित्व को आकार दिया और उन्हें समाज सेवा के मार्ग पर दृढ़ बनाए रखा। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि मनुष्य अकेले आगे नहीं बढ़ता। उसके पीछे परिवार का त्याग, विचारों की दिशा, समाज का विश्वास और संघर्षों से मिली सीख साथ चलती है।

वे अपने पिता बाबूराव नामदेव गायकवाड और माता सीता बाबूराव गायकवाड के प्रति हृदय से कृतज्ञ हैं। साधारण परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने पुत्र को मेहनत, साहस और आत्मसम्मान का संस्कार दिया। विशेष रूप से उनकी माता की वह सीख उनके जीवन में हमेशा जीवित रही, जिसमें उन्होंने उन्हें संघर्ष से पीछे न हटने और समाज में डटकर खड़े रहने की प्रेरणा दी।

वे अपनी पत्नी सुषमा रमेश गायकवाड के प्रति भी गहरा आभार व्यक्त करते हैं। उनके सामाजिक और राजनीतिक कार्यों की व्यस्तता के बीच उन्होंने परिवार, बच्चों और घर की जिम्मेदारियों को धैर्यपूर्वक संभाला। उनके सहयोग ने डॉ. गायकवाड को समाज के लिए लगातार कार्य करने की शक्ति दी। उनके पुत्र अभिजीत और आदित्य, तथा पुत्री अस्मिता भी उनके जीवन की भावनात्मक शक्ति रहे हैं।

वे डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर, भगवान बुद्ध और छत्रपति शिवाजी महाराज के विचारों के प्रति श्रद्धा रखते हैं, जिनसे उन्हें समानता, करुणा, अधिकार और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की दिशा मिली।

वे रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया, रामदास आठवले, अपने साथ जुड़े कार्यकर्ताओं, समर्थकों और उन सभी लोगों के प्रति कृतज्ञ हैं, जिन्होंने उनके सामाजिक कार्यों में विश्वास रखा। यह आभार उन गरीबों, विद्यार्थियों, महिलाओं, श्रमिकों और वंचित परिवारों के प्रति भी है, जिनकी सेवा ने उनके जीवन को उद्देश्य दिया।

धन्यवाद,

– डॉ. रमेश बाबूराव गायकवाड