"सात अवॉर्ड नहीं, मेरा असली अवॉर्ड है उन बच्चों की मुस्कान, जो मेरे स्कूल में पढ़ते हैं। काम करो, मिले या न मिले, लेकिन करो।"

परिचय

हर जीवन अपनी गति से आगे बढ़ता है, पर कुछ यात्राएँ ऐसी होती हैं जो समय के साथ एक अर्थपूर्ण स्वरूप ले लेती हैं। डॉ. समरेंद्र कुमार का जीवन उसी तरह की एक शांत, निरंतर और उद्देश्यपूर्ण यात्रा का उदाहरण है, जिसमें अनुभवों ने उन्हें आकार दिया और उन्होंने उन अनुभवों को अपने कार्यों में रूपांतरित किया।

पटना में जन्मे इस व्यक्तित्व की पहचान केवल एक शिक्षक के रूप में सीमित नहीं है। वे एक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने समाज को समझने और उससे जुड़ने की प्रक्रिया को अपने जीवन का हिस्सा बनाया। समाजशास्त्र के क्षेत्र से उनका जुड़ाव केवल अकादमिक नहीं रहा, बल्कि यह उनके सोचने के तरीके और जीवन को देखने की दृष्टि का आधार बन गया। लोगों की परिस्थितियों को समझना, उनके बीच संतुलन बनाए रखना और जीवन को सरलता से स्वीकार करना, ये सभी गुण उनके व्यक्तित्व में स्वाभाविक रूप से दिखाई देते हैं।

उनकी पेशेवर यात्रा सीधे शिक्षा से शुरू नहीं हुई। दिल्ली में रियल एस्टेट के क्षेत्र में काम करते हुए उन्होंने व्यावसायिक दुनिया को नज़दीक से देखा। इसके बाद कोटक के साथ जुड़ाव ने उन्हें संगठित कार्यशैली, अनुशासन और समय के महत्व को समझने का अवसर दिया । इन अनुभवों ने उन्हें बहुत कुछ सिखाया, लेकिन साथ ही यह भी महसूस कराया कि केवल काम करना ही पर्याप्त नहीं है, काम का उद्देश्य भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।

इसी समझ ने धीरे-धीरे उनके भीतर एक स्पष्ट दिशा तैयार की। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र को अपनाया, जहाँ वे आज वीर बहादुर राम बहादुर सिंह यादव कॉलेज, पटना में समाजशास्त्र के शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं। उनका यह कार्य केवल एक पेशा नहीं है, बल्कि एक ऐसी जिम्मेदारी है जिसे वे निरंतर निभाते आ रहे हैं।

इसके साथ ही, उन्होंने अपने प्रयासों को एक व्यापक रूप दिया दमयंती पब्लिक स्कूल के माध्यम से, जो रोहतास, बिहार में स्थित है। यह संस्थान केवल शिक्षा देने का स्थान नहीं है, बल्कि एक सोच का विस्तार है, जहाँ बच्चों को सीखने का अवसर मिलता है, चाहे उनकी परिस्थितियाँ कैसी भी हों। यहाँ शिक्षा केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रहती, बल्कि एक ऐसा वातावरण तैयार किया जाता है जहाँ बच्चे आगे बढ़ने की प्रेरणा पाते हैं।

इस यात्रा में उनका साथ उनकी पत्नी, रीता दयाल, ने मजबूती से निभाया है, जो इसी विद्यालय की प्रिंसिपल हैं। यह सहयोग केवल पारिवारिक नहीं है, बल्कि एक साझा उद्देश्य का परिणाम है, जहाँ दोनों मिलकर एक ऐसी व्यवस्था को बनाए रखते हैं जो निरंतर विकसित हो रही है।

उनका कार्य केवल उनके संस्थान तक सीमित नहीं है। वे राष्ट्र रतन एवं प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन के सचिव के रूप में भी सक्रिय हैं, जहाँ वे अनेक विद्यालयों के साथ मिलकर शिक्षा से जुड़े कार्यों में योगदान दे रहे हैं। इस भूमिका में उन्होंने न केवल नेतृत्व किया है, बल्कि सामूहिक प्रयासों को एक दिशा देने का कार्य भी किया है।

उनकी प्रतिबद्धता और कार्य के प्रति निरंतरता को कई बार सराहा गया है। उन्हें प्राइवेट स्कूल एंड चिल्ड्रेन वेलफेयर एसोसिएशन द्वारा सात बार बेस्ट एजुकेटर के सम्मान से नवाज़ा जा चुका है। यह उपलब्धि केवल पुरस्कारों की संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि उस विश्वास का प्रतीक है जो उनके कार्यों के प्रति लोगों में बना है।

उनके जीवन का एक विशेष पहलू यह भी है कि उनकी यात्रा को उनके अपने परिवार ने भी महसूस किया है। उनकी पुत्री, विशाखा, ने Journey of 25 Yrs नामक पुस्तक लिखकर उनके और उनकी पत्नी के जीवन को शब्दों में संजोया । यह केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि उस संबंध और अनुभव का प्रतिबिंब है जिसे उन्होंने वर्षों तक जिया है।

उनकी सोच में एक स्पष्ट सरलता है। वे जीवन को जटिल बनाने के बजाय उसे सहज रूप में स्वीकार करने में विश्वास रखते हैं। उनका मानना है कि व्यक्ति को स्वयं खुश रहना चाहिए और अपने आसपास के लोगों को भी खुश रखने की कोशिश करनी चाहिए। यही विचार उनके व्यवहार और कार्यों में लगातार दिखाई देता है।

यह परिचय केवल एक जीवन का आरंभिक परिचय नहीं है, बल्कि उस दृष्टिकोण की झलक है, जो उनके हर निर्णय में मौजूद रहा है। उनकी यात्रा यह बताती है कि जब व्यक्ति अपने अनुभवों को समझते हुए आगे बढ़ता है, तो वह केवल अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए भी एक मार्ग बना सकता है।

“माँ को खोने के बाद लगा जैसे घर से रोशनी चली गई। उसी अंधेरे ने मुझे दूसरों के दर्द को समझना सिखाया।मैंने शब्दों से ज़्यादा चुप्पी को सुनना सीखा गया।”

Phase 1: शुरुआती घाव एवं संवेदनशीलता

पटना में जन्मे डॉ. समरेंद्र कुमार का प्रारंभिक जीवन एक ऐसी घटना से प्रभावित हुआ, जिसने उनके भीतर की दुनिया को बहुत कम उम्र में ही बदल दिया। बचपन में ही उनकी माता, स्वर्गीय दमयंती देवी का निधन हो गया था। वे बच्चों से अत्यंत स्नेह करती थीं और उनके प्रति उनका प्रेम तथा ममता परिवार की स्मृतियों में सदैव जीवित रही। आगे चलकर उनकी स्मृति और आदर्शों को सम्मान देने के लिए उनके नाम पर दमयंती पब्लिक स्कूल की स्थापना की गई, जो आज शिक्षा और समाज सेवा के क्षेत्र में एक सार्थक योगदान दे रहा है। यह क्षण उनके जीवन का पहला गहरा अनुभव था, जिसने उन्हें अचानक एक ऐसी वास्तविकता के सामने खड़ा कर दिया, जिसे समझना आसान नहीं होता।

उन्हें याद है कि एक दिन उन्हें पटना बुलाया गया, यह बताते हुए कि घर में कुछ जरूरी बात है। उस समय उन्हें केवल इतना पता था कि माता की तबीयत ठीक नहीं है। जब वे वहाँ पहुँचे, तब सच्चाई सामने आई। उस पल ने उनके भीतर एक स्थायी चुप्पी छोड़ दी, एक ऐसी अनुभूति जो शब्दों में व्यक्त नहीं होती, बल्कि व्यक्ति के स्वभाव का हिस्सा बन जाती है।

इसके बाद उनका बचपन किसी एक स्थान पर सीमित नहीं रहा। पिता, श्री राम प्रसाद, उस समय असम में सरकारी सेवा में थे, इसलिए उन्हें अपनी शिक्षा और परवरिश के लिए अलग-अलग रिश्तेदारों के साथ रहना पड़ा। कभी चाचा-चाची के घर, कभी अन्य परिजनों के बीच, उन्होंने परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालना सीखा। यह बदलाव भले ही सहज नहीं थे, लेकिन उन्होंने उन्हें जल्दी समझदार बना दिया।

आर्थिक रूप से उनका परिवार एक सामान्य स्थिति में था, परंतु जीवन में निरंतर मार्गदर्शन का अभाव उन्हें स्वयं अपने निर्णय लेने की ओर ले गया। यह स्थिति चुनौतीपूर्ण होने के साथ-साथ उन्हें स्वतंत्र सोच और आत्मनिर्भरता की ओर भी ले गई। उन्होंने धीरे-धीरे यह समझना शुरू किया कि जीवन में दिशा हमेशा बाहर से नहीं मिलती, कई बार उसे स्वयं ही तय करना पड़ता है।

उनके पिता का प्रभाव उनके जीवन में एक शांत लेकिन गहरा आधार बना। वे सरल स्वभाव के व्यक्ति थे और अपने समय का एक हिस्सा बच्चों को निःशुल्क पढ़ाने में लगाते थे। यह उनके लिए केवल एक आदत नहीं थी, बल्कि एक मूल्य था। इस वातावरण ने यह विचार उनके भीतर स्थापित किया कि ज्ञान का वास्तविक अर्थ तब है, जब उसे साझा किया जाए।

बचपन के इन्हीं अनुभवों ने उनके भीतर एक विशेष प्रकार का धैर्य विकसित किया। वे सुनने वाले बने, समझने वाले बने, और परिस्थितियों पर तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय उन्हें स्वीकार करना सीखते गए। उनके स्वभाव में एक सहज संयम दिखाई देने लगा, जो आगे चलकर उनके व्यक्तित्व की पहचान बना ।

इसी समय उनके भीतर लोगों को साथ लेकर चलने की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति भी विकसित हुई। यह किसी औपचारिक नेतृत्व की तरह नहीं थी, बल्कि एक आदत थी: लोगों की बात सुनना, उन्हें जोड़कर रखना, और हर परिस्थिति में संतुलन बनाए रखना।

इस चरण ने उनके जीवन को कोई स्पष्ट दिशा नहीं दी, लेकिन एक ऐसा आधार अवश्य दिया, जिस पर आगे की पूरी यात्रा खड़ी हुई। यही वह समय था, जब उनके भीतर संवेदनशीलता, धैर्य और आत्मनिर्भरता के बीज शांत रूप से स्थापित हुए।

“पिताजी दूर थे, लेकिन मेरी बहनों ने मुझे कभी अकेला महसूस नहीं होने दिया। उनके हाथों का स्नेह ही वह ज़मीन थी, जिस पर मैंने सपने देखना सीखा।”

Phase 2 : बहनों का हाथ : अटूट सहारा

माँ के न रहने के बाद जीवन अचानक एक नए ढंग से आगे बढ़ने लगा। स्थिरता का जो भाव सामान्यतः एक घर में मिलता है, वह अब परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहता था। ऐसे समय में डॉ. समरेंद्र कुमार के लिए परिवार केवल एक संबंध नहीं रहा, बल्कि वह एक ऐसा आधार बना, जिसने उन्हें संभाले रखा।

उनके पिता, श्री राम प्रसाद, उस समय अपने कर्तव्यों में व्यस्त थे। सरकारी सेवा के कारण उनका अधिकांश समय असम में बीतता था । इस दूरी ने पिता और पुत्र के संबंध को कमजोर नहीं किया, बल्कि उसे एक अलग प्रकार की समझ और सम्मान में बदल दिया। उनके व्यक्तित्व में जो अनुशासन और सादगी दिखाई देती है, वह इसी दूरस्थ लेकिन प्रभावशाली उपस्थिति का परिणाम है।

इस बीच, उनके जीवन में उनकी बहनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। परिवार में तीन बहनें थीं, जिनमें से दो बड़ी बहनों ने एक विशेष जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। उन्होंने केवल भाई का ख्याल नहीं रखा, बल्कि उसे उस स्नेह और मार्गदर्शन से भी जोड़ा, जिसकी कमी वह महसूस कर सकता था। यह भूमिका किसी औपचारिक जिम्मेदारी की तरह नहीं थी, बल्कि एक स्वाभाविक अपनत्व से उपजी थी।

बचपन के उन दिनों में, जब परिस्थितियाँ लगातार बदल रही थीं, इन बहनों ने एक स्थिर भाव बनाए रखा। उन्होंने उसे यह एहसास दिलाया कि जीवन चाहे जैसा भी हो, उसके भीतर एक सहारा हमेशा मौजूद रहता है। उनके व्यवहार में जो सहजता और अपनापन था, उसने उनके भीतर एक विश्वास पैदा किया कि वह अकेले नहीं है।

उनकी छोटी बहन उस समय बहुत छोटी थी, लगभग एक वर्ष की। इस स्थिति ने उनके भीतर एक अलग प्रकार की जिम्मेदारी भी जगा दी। उन्होंने उसे केवल एक बहन के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसके प्रति एक संरक्षक की भावना भी विकसित की। यह भाव धीरे-धीरे उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन गया, जहाँ वे केवल अपने बारे में नहीं, बल्कि अपने आसपास के लोगों के बारे में भी सोचने लगे।
यह समय उनके लिए केवल परिस्थितियों से गुजरने का नहीं था, बल्कि उन्हें समझने का भी था। परिवार के भीतर जो संबंध बने, उन्होंने उन्हें यह सिखाया कि जीवन केवल व्यक्तिगत अनुभवों से नहीं, बल्कि साझा भावनाओं से भी बनता है। हर व्यक्ति का योगदान अलग होता है, लेकिन मिलकर वे एक ऐसा वातावरण तैयार करते हैं, जो व्यक्ति को आगे बढ़ने की शक्ति देता है।

उनके जीवन में यह भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि उन्होंने इन अनुभवों को केवल महसूस ही नहीं किया, बल्कि उन्हें अपने स्वभाव का हिस्सा बना लिया। उन्होंने संबंधों को महत्व देना सीखा, लोगों को समझना सीखा, और हर परिस्थिति में संतुलन बनाए रखना सीखा।

इन वर्षों ने उन्हें यह सिखाया कि सहारा हमेशा बड़े रूप में नहीं आता। कई बार वह छोटे-छोटे व्यवहारों में छिपा होता है किसी का साथ, किसी का विश्वास, या केवल यह एहसास कि कोई है जो आपके साथ खड़ा है। यही बातें उनके भीतर धीरे-धीरे गहराई से बैठती चली गई।

यह चरण उनके जीवन में एक ऐसी परत जोड़ता है, जहाँ परिवार की भूमिका केवल पृष्ठभूमि तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह उनके व्यक्तित्व का सक्रिय हिस्सा बन जाती है। यहाँ उन्होंने यह समझा कि मजबूती केवल भीतर से नहीं आती, बल्कि वह उन संबंधों से भी आती है, जो व्यक्ति को हर परिस्थिति में संतुलित रखते हैं।

इसी अनुभव ने उनके भीतर एक ऐसा दृष्टिकोण विकसित किया, जहाँ वे आगे चलकर भी लोगों को जोड़ने, उनके साथ खड़े रहने और उनके लिए कुछ करने की भावना को अपने जीवन का हिस्सा बना सके।

“मेरे पास कोई गुरु नहीं था जो बताता कि क्या सही है। इसलिए मैंने गलतियों से सीखना शुरू किया। हाँ, अंग्रेज़ी बोलने में मुझे आज भी झिझक होती है, लेकिन इसलिए मैं सच्चाई से बात करता हूँ।”

Phase 3 : मार्गदर्शन के अभाव में खुद बनाया रास्ता

जीवन के कुछ चरण ऐसे होते हैं, जहाँ व्यक्ति किसी स्पष्ट दिशा के साथ नहीं, बल्कि परिस्थितियों के बीच अपनी समझ के सहारे आगे बढ़ता है। डॉ. समरेंद्र कुमार के जीवन में यह वही समय था, जब उन्हें यह एहसास होने लगा कि हर प्रश्न का उत्तर बाहर से नहीं मिलता और हर निर्णय के पीछे कोई मार्गदर्शक उपस्थित नहीं होता। उनका पारिवारिक परिवेश संतुलित था, जहाँ मूलभूत आवश्यकताओं की कमी नहीं थी, लेकिन आगे की राह को लेकर निरंतर मार्गदर्शन का अभाव स्पष्ट था। पढ़ाई के बाद कौन-सा विषय चुनना है, किस दिशा में बढ़ना है, या जीवन को किस रूप में आगे ले जाना है, इन सबका उत्तर उन्हें स्वयं ही खोजना पड़ा। यह स्थिति किसी दबाव की तरह सामने नहीं आई, बल्कि धीरे-धीरे उनके भीतर एक अलग प्रकार की सोच विकसित करती चली गई, जहाँ उन्होंने निर्णय लेने की जिम्मेदारी को स्वीकार करना सीखा।

इस दौर में उनके व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पक्ष उभरकर सामने आया: संतुलित दृष्टिकोण। वे किसी भी परिस्थिति या बातचीत पर तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय उसे समझने का प्रयास करते थे। सुनने की आदत उनके भीतर गहराई से स्थापित हो चुकी थी, और यही आदत उन्हें दूसरों से जोड़ने में भी सहायक बनी। लोगों को साथ लेकर चलना उनके लिए किसी औपचारिक भूमिका का हिस्सा नहीं था, बल्कि यह उनके स्वभाव का सहज विस्तार था। वे हर परिस्थिति में संयम बनाए रखते, किसी के शब्दों से प्रभावित होकर तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय उसे स्वीकार करने और समझने की कोशिश करते। यही गुण समय के साथ उनके व्यक्तित्व की पहचान बन गया, जिसमें प्रभाव शब्दों से नहीं, बल्कि व्यवहार से उत्पन्न होता है।

इसी समय उनके भीतर जीवन को लेकर एक स्पष्ट समझ विकसित होने लगी कि इसे किसी निश्चित ढाँचे में बाँधकर नहीं देखा जा सकता। उन्होंने परिस्थितियों को बदलने की कोशिश करने के बजाय उन्हें समझना और उसी के अनुरूप आगे बढ़ना अधिक उपयुक्त माना। यह दृष्टिकोण उन्हें हर स्थिति में स्थिर बनाए रखता था । शिक्षा के दौरान उनकी रुचि धीरे-धीरे समाजशास्त्र की ओर केंद्रित होने लगी। यह चयन किसी बाहरी प्रभाव का परिणाम नहीं था, बल्कि उनके भीतर विकसित हो रही उस समझ का हिस्सा था, जिसमें वे समाज, लोगों और उनके व्यवहार को गहराई से जानना चाहते थे।

इस अवधि का एक और महत्वपूर्ण पहलू उनकी आत्मस्वीकृति रही। उन्होंने अपनी एक कमी को बिना किसी झिझक के स्वीकार किया— अंग्रेज़ी बोलने में सहजता का अभाव। वे भाषा को समझते थे, लेकिन उसमें संवाद करने में पूरी तरह सहज नहीं थे । इस कमी को उन्होंने छिपाने या उससे बचने की कोशिश नहीं की, बल्कि उसे उसी रूप में स्वीकार किया। यह स्वीकृति उनके व्यक्तित्व की सच्चाई को दर्शाती है, जहाँ वे अपने आप को बिना किसी बनावट के देखते और समझते हैं।

यह चरण बाहरी रूप से भले ही सामान्य प्रतीत हो, लेकिन इसी ने उनके भीतर वह स्पष्टता विकसित की, जो आगे चलकर उनके हर निर्णय में दिखाई देती है। उन्होंने यह समझ लिया कि जीवन की दिशा तय करने के लिए हमेशा बाहरी संकेतों की आवश्यकता नहीं होती। जब व्यक्ति अपने अनुभवों से सीखते हुए आगे बढ़ता है, तो उसका हर कदम अधिक स्थिर और सहज हो जाता है। यही वह समय था, जब उनके भीतर एक शांत आत्मविश्वास विकसित हुआ, ऐसा आत्मविश्वास, जो दिखावे पर नहीं, बल्कि भीतर की समझ पर आधारित होता है।

आभार ज्ञापन

इस यात्रा को शब्दों में संजोना केवल एक व्यक्ति की कहानी लिखना नहीं, बल्कि उन सभी संबंधों और सहयोगों को सम्मान देना है, जिन्होंने इसे संभव बनाया। डॉ. समरेंद्र कुमार के जीवन में जो स्थिरता और निरंतरता दिखाई देती है, उसके पीछे कई ऐसे हाथ हैं, जिनका योगदान शांत रहते हुए भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है।

सबसे पहले, उनके जीवन में परिवार का स्थान गहराई से जुड़ा हुआ है। उनके पिता, श्री राम प्रसाद, की सादगी और कर्मनिष्ठा ने उन्हें जीवन को एक संतुलित दृष्टि से देखने की प्रेरणा दी। उनके जीवन में यह प्रभाव हमेशा एक आधार की तरह मौजूद रहा है। इसी के साथ, उनकी बहनों का सहयोग भी उतना ही महत्वपूर्ण रहा, जिन्होंने हर परिस्थिति में उनका साथ देकर उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया ।

उनकी जीवनसंगिनी, रीता दयाल, का साथ इस यात्रा का एक अभिन्न हिस्सा है। एक ऐसे व्यक्ति के रूप में, जिन्होंने हर जिम्मेदारी को गंभीरता से निभाया, उनके साथ का संतुलन और सहयोग इस पूरे प्रयास को स्थिरता देता है। यह संबंध केवल व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक साझा उद्देश्य के रूप में भी सामने आया।

उनके मित्रों का साथ भी इस यात्रा में निरंतर बना रहा। अखिलेश कुमार, आनंद सिंह, प्रशांत कुमार और अरविंद भारती जैसे साथियों ने हर चरण में उनका मनोबल बनाए रखा और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। यह सहयोग केवल शब्दों तक सीमित नहीं था, बल्कि हर परिस्थिति में साथ खड़े रहने के रूप में दिखाई देता है।

अंततः, यह आभार उन सभी के लिए भी है, जो उनके जीवन के किसी भी चरण में उनसे जुड़े। उनके साथ बिताए गए हर अनुभव ने इस यात्रा को और अधिक सार्थक बनाया। यही संबंध और यही सहयोग इस कहानी की वास्तविक शक्ति हैं, जिन्होंने इसे एक साधारण जीवन से आगे बढ़ाकर एक अर्थपूर्ण यात्रा में बदल दिया।

धन्यवाद।
– डॉ. समरेंद्र कुमार