Dr. Sangita Kapse

"सपने देखने से ज़्यादा ज़रूरी है, उन पर विश्वास करना — और हर गिरावट के बाद फिर से उठ खड़ा होना।"

परिचय

कुछ जीवन अपनी सादगी में भी इतने प्रभावशाली होते हैं कि वे शब्दों से नहीं, संवेदनाओं से पढ़े जाते हैं। डॉ. संगीता कापसे का जीवन एक ऐसी ही संगीतात्मक और संघर्षपूर्ण गाथा है—जहाँ दर्द ने ताल और आँसुओं ने स्वर दिया, और अंततः उस जीवन ने समाज को वह रचना दी जिसे हम “प्रेरणा” कहते हैं। 

डॉ. संगीता कापसे का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ, पर उनका मन किसी असाधारण स्वप्न की ओर आकर्षित था। बाल्यकाल से ही उन्हें कला से विशेष लगाव था, विशेषतः नृत्य, जो उनके लिए केवल मंच की प्रस्तुति नहीं, बल्कि अंतर्मन की आराधना था। एक कलाकार माँ की छाया में पले-बढ़े सपनों ने जल्दी ही उड़ान भरनी चाही, पर समाज और परिस्थितियों की जंजीरों ने बार-बार उन्हें रोकना चाहा। 

परिवार की आर्थिक स्थिति सीमित थी, और सामाजिक सोच उससे भी अधिक संकीर्ण। विवाह, मातृत्व, पारिवारिक जिम्मेदारियाँ—इन सबने उनके नृत्य के सुरों को दबाने की कोशिश की। और तब एक दिन, एक दुर्घटना ने उनकी टांग को बुरी तरह चोट पहुँचाई। डॉक्टरों ने कह दिया — अब नृत्य असंभव है। शायद यही वह मोड़ था जहाँ अधिकांश लोग अपने स्वप्नों को अंतिम प्रणाम कह देते हैं। लेकिन डॉ. संगीता कापसे ने हार मानने से इनकार कर दिया। 

उनके भीतर की कलाकार को मरने नहीं दिया। वह प्रेरित हुईं एक सिनेमा से, पर असली हिम्मत उन्होंने अपने भीतर से ही अर्जित की। उन्होंने दर्द को अपनी शक्ति बनाया, और हर उस आह को रचना का हिस्सा। धीरे-धीरे उन्होंने न केवल फिर से नृत्य करना शुरू किया, बल्कि अपनी कला को समाज के सबसे वंचित वर्ग तक पहुँचाया। 

उन्होंने संगीता कला अकादमी (संगीता कला एकेडमी (Sangita Kala Academy) ) की स्थापना की—एक ऐसा मंच जो आज हजारों बच्चों के जीवन को आकार देने का कार्य कर रहा है, विशेषकर उन बच्चों के लिए जो आर्थिक या सामाजिक रूप से हाशिए पर हैं। यहाँ केवल नृत्य नहीं सिखाया जाता, यहाँ आत्मविश्वास, आत्म-सम्मान और स्वावलंबन का पाठ पढ़ाया जाता है। 

इस जीवनी के पृष्ठों में आपको एक साधारण स्त्री की असाधारण यात्रा मिलेगी। यह कहानी है संघर्ष, समर्पण और सृजन की। यह उस यथार्थ की गाथा है जहाँ एक नारी ने अपने भीतर की पीड़ा को साधना में बदला और फिर उसी साधना को सेवा में परिवर्तित किया। 

डॉ. संगीता कापसे का जीवन हमें यह सिखाता है कि जब आत्मा सच्चे भाव से नाचे, तो शरीर की सीमाएँ और समाज की दीवारें स्वतः गिर जाती हैं। यह कहानी है उस हिम्मत की, जो हर हारे हुए दिल को फिर से उम्मीद देती है। 

"कला केवल प्रदर्शन नहीं, आत्मा की पुकार होती है — और जिसने इसे सुन लिया, वह कभी थमता नहीं।"

बचपन की झलकियाँ

Dr. Sangita Kapse

23 जून 1971 की तपती दोपहर में जब छत्तीसगढ़ के रायपुर शहर में एक बालिका का जन्म हुआ, तब किसी को यह आभास न था कि यह नन्ही कली एक दिन कला की बगिया में अनगिनत सुगंध बिखेरेगी। उनका नाम रखा गया — संगीता। एक ऐसा नाम जो बाद में न केवल उनकी पहचान बना, बल्कि एक आंदोलन बन गया। 

उनके पिता पांडुरंग भामकर एक अनुशासित और मूल्यनिष्ठ पुरुष थे, जो पारंपरिक मराठी संस्कारों में गहराई से जड़े हुए थे। माता इंटू ताई भामकर, स्वयं एक कला प्रेमी और सृजनशील व्यक्तित्व की धनी थीं। यहीं से संगीता को अपनी कलात्मक चेतना की पहली थाप मिली — एक विरासत, जो मौन में संगीतमय थी। 

रायपुर उन दिनों विकास की राह पर था, परंतु सांस्कृतिक जागरूकता सीमित थी, विशेषकर मध्यमवर्गीय परिवारों में। डांस को एक ‘कलंक’ के रूप में देखा जाता था। परन्तु, छोटी संगीता के भीतर नृत्य की जो लहरें हिलोरें मार रही थीं, वे किसी सामाजिक दीवार से थमने वाली नहीं थीं। 

“जब भी घुंघरू की आवाज़ सुनती थी, मेरे भीतर कुछ काँप उठता था, जैसे आत्मा जाग उठी हो।” 

उनका पहला प्रेम था — घुंघरू। स्कूल में भरतनाट्यम सिखाने के लिए एक दक्षिण भारतीय शिक्षक आया करते थे। संगीता उन्हें बाहर से छिपकर सुनतीं, पैरों की थापों को मन में गिनतीं और वैसा ही करने की कोशिश करतीं। यह साधना नहीं थी, यह भक्ति  थी। 

परंतु एक दिन, जीवन ने ऐसा मोड़ लिया, जिससे शायद कमज़ोर आत्माएं टूट जातीं। 

संगीता महज़ कुछ महीनों से भरतनाट्यम सीख रही थीं, जब एक विशाल दीवार उनके ऊपर आ गिरी। शरीर के साथ उनके दाहिने पैर की नस पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई। पूरे शहर में खबर फैल गई — “एक बच्ची पर पूरी दीवार गिर गई।” 

डॉक्टरों ने कहा — “डांस भूल जाओ। दौड़ना, खेलना, सब कुछ बंद।” 

एक कलाकार के लिए यह शब्द मृत्यु से कम नहीं होते। 

पर फिर आया वो क्षण, जिसने उनके जीवन की परिभाषा ही बदल दी — फिल्म “नाचे मयूरी”। 

"जब जीवन ने रास्ता रोका, मैंने नृत्य में दिशा खोजी — और हर ठोकर को ताल बना लिया।"

जब उम्र ने हार मानी और नृत्य ने पुनर्जन्म पाया

Dr. Sangita Kapse

सालवर्ष 2010 की बात है। स्थान — छत्तीसगढ़ का एक औद्योगिक क्षेत्र, जहाँ शहरी चमक नहीं थी, सुविधाएँ सीमित थीं, और जीवन एक तयशुदा रूटीन के सहारे चल रहा था। यहीं एक लाफार्ज सीमेंट प्लांट था, जहाँ डॉ. संगीता कापसे अपने पति और बच्चों के साथ एक संयमित जीवन जी रही थीं। पर उस संयम के भीतर एक तूफान था — एक अधूरी चाह, एक अनकही कहानी, और एक दबी हुई कला, जो बरसों से अभिव्यक्ति की राह देख रही थी। 

एक दिन प्लांट परिसर में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया — साधारण आयोजन, पर डॉ. संगीता कापसे के लिए वह असाधारण अवसर बन गया। जब उन्होंने मंच पर “नाचे मयूरी” के प्रसिद्ध भाव-नृत्य को प्रस्तुत किया, तो दर्शकों की साँसें थम गईं। कोई विश्वास नहीं कर पा रहा था कि यह महिला, जो अभी तक एक गृहिणी और एक माँ के रूप में देखी जाती थी, इतनी प्रखर नृत्यांगना कैसे हो सकती है? 

एक दिन प्लांट परिसर में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया — साधारण आयोजन, पर डॉ. संगीता कापसे के लिए वह असाधारण अवसर बन गया। जब उन्होंने मंच पर “नाचे मयूरी” के प्रसिद्ध भाव-नृत्य को प्रस्तुत किया, तो दर्शकों की साँसें थम गईं। कोई विश्वास नहीं कर पा रहा था कि यह महिला, जो अभी तक एक गृहिणी और एक माँ के रूप में देखी जाती थी, इतनी प्रखर नृत्यांगना कैसे हो सकती है? 

उनकी लयबद्ध गति, उनकी आँखों की अभिव्यक्ति, और भावनाओं की बारीकी — सब कुछ मंत्रमुग्ध कर देने वाला था। दर्शकों में उपस्थित थीं वहाँ के उपाध्यक्ष की धर्मपत्नी, एक संस्कृतिप्रेमी महिला। वे मंच समाप्त होते ही दौड़ती हुई आईं और कहा “बाप रे संगीता! तुम्हारे अंदर तो साक्षात सरस्वती विराजमान हैं। कहाँ सीखा इतना सुंदर नृत्य?” 

डॉ. संगीता कापसे का उत्तर सहज, पर भीतर से टूटा हुआ था  “मैंने औपचारिक रूप से नहीं सीखा, मैम। टीवी, यूट्यूब और दिल से सीखा है। नृत्य मेरा सपना था जो कभी पूरा नहीं हो पाया।

उन शब्दों ने उस महिला को झकझोर दिया। उन्होंने तुरंत कहा

“तुम इस कला को आगे बढ़ाओ। इस स्तर की प्रतिभा को दबा कर रखना, अपने ऊपर भी अन्याय है और समाज के ऊपर भी।” 

"हौसले की कोई उम्र नहीं होती, और जुनून कभी थकता नहीं — बस एक बार फिर से उठ खड़े होने की देर होती है।"

संघर्ष से साधना तक की यात्रा

Dr. Sangita Kapse

जब जीवन बार-बार कठिनाइयों से टकराता है, तब वही लोग इतिहास बनाते हैं जो हार मानने के बजाय, हर चोट को प्रेरणा बना लेते हैं। डॉ. संगीता कापसे का जीवन भी ऐसी ही एक अनुपम कथा है — जहाँ न केवल उनके अपने संकल्प ने उन्हें आगे बढ़ाया, बल्कि उनके परिवार का निःस्वार्थ सहयोग भी उनके पथ की रौशनी बन गया

अपने नृत्य-साधना की दूसरी पारी शुरू करते हुए डॉ. संगीता कापसे ने न केवल सामाजिक परिधियों को चुनौती दी, बल्कि गृहिणी, माँ और साधिका — इन तीनों रूपों को एक साथ निभाते हुए आत्म-निर्माण की ऐसी मिसाल पेश की, जो हर नारी के लिए प्रेरणा बन सकती है। 

सुबह 7:00 बजे डॉ. संगीता कापसे श्रीराम संगीत महाविद्यालय जाया करतीं और वहाँ पर कथक नृत्य का नियमित अभ्यास करती थीं। यह वही दौर था जब उनके दोनों बच्चे — बेटा कॉलेज और बेटी स्कूल जाती थी — और वह स्वयं, उम्र और जिम्मेदारियों की सीमाओं को पार करते हुए अपने सपनों की ओर अग्रसर होती थीं। नृत्य केवल एक कला नहीं थी, इसने डॉ. संगीता कापसे के जीवन को नई पहचान दी। वह उनके अस्तित्व की पुनर्परिभाषा थी। उनके भीतर जैसे हर ताल, हर भाव, हर मुद्राएँ उनकी आत्मा से फूट पड़ती थीं। 

लगातार अभ्यास और समर्पण से उन्होंने ऑल इंडिया कथक मेरिट लिस्ट में टॉप 3 स्थान प्राप्त किया — जो न केवल एक उपलब्धि थी, बल्कि उनके जीवन की एक नयी शुरुआत का प्रतीक भी बना। उनके इस पुनरागमन की कहानी सिर्फ मंच की नहीं, उनके आत्मबल की थी। उन्होंने धीरे-धीरे राष्ट्रीय और राज्यस्तरीय मंचों पर प्रस्तुति देना प्रारंभ किया और एक-एक कर उनकी प्रतिभा ने दर्शकों को चकित कर दिया। 

इस पूरी यात्रा में उनके परिवार ने जिस तरह साथ निभाया, वह शब्दों से परे है। डॉ. संगीता कापसे स्वयं स्वीकार करती हैं कि यदि उनके पति, सासू माँ, माता-पिता, बच्चे और उनके मित्रों ने हर मोड़ पर उनका समर्थन न किया होता — चाहे वह आर्थिक पक्ष हो या मानसिक समर्थन — तो वह कभी इस मुकाम तक नहीं पहुँच पातीं। 

उनके पुत्र और पुत्री ने भी उनके सपनों को केवल समझा ही नहीं, बल्कि उसमे हिस्सेदारी निभाई। जब बेटा कॉलेज में होता और बेटी स्कूल में, तब मां अपने पैरों में घाव लिए भी नृत्य के लिए अभ्यासशाला पहुँच जातीं। यह दृश्य सिर्फ त्याग का नहीं था — यह उस जीवन-दृष्टि का था, जहाँ कोई स्त्री अपने आप ‘स्व’ को फिर से खोजती है।

अंतिम संदेश

हर जीवन अपने पीछे कुछ न कुछ छोड़ता है—कभी केवल यादें, तो कभी एक अमिट प्रभाव। परंतु कुछ जीवन ऐसे होते हैं, जो समय की सीमाओं को लांघकर एक ध्वनि बन जाते हैं—जो वर्षों तक गूंजती है, पीढ़ियों को जगाती है और एक नए युग की राह दिखाती है। डॉ. संगीता कापसे का जीवन भी ऐसी ही एक अनुगूंज है—जो महज़ एक महिला की नहीं, बल्कि असंख्य महिलाओं, विद्यार्थियों और कला साधकों की कहानी बन गई है। 

यह ‘अंतिम निर्णय’ अध्याय कोई निष्कर्ष नहीं है, बल्कि वह सार है जो उनके जीवन की प्रत्येक सीख, संघर्ष और साधना से निकला है। यह वह दर्शन है जिसे वे न केवल जिया करती थीं, बल्कि दूसरों को जीनें की प्रेरणा भी देती थीं। 

डॉ. संगीता कापसे ने समाज में व्याप्त उस रूढ़ मानसिकता को चुनौती दी, जिसमें एक स्त्री का स्थान केवल घर की चारदीवारी तक सीमित समझा जाता है। उन्होंने यह साकार किया कि स्त्री केवल गृहकार्य में नहीं, कला, शिक्षा, और नेतृत्व में भी उतनी ही दक्ष होती है। 

उनका जीवन इस विचार को पुनर्परिभाषित करता है कि विवाह, मातृत्व या सामाजिक बंधन किसी भी स्त्री की उड़ान की सीमा नहीं होते। बल्कि यही अनुभव जब कला के साथ जुड़ते हैं, तो वे उसे और अधिक गहराई और गरिमा प्रदान करते हैं। 

उनके जीवन का अंतिम संदेश यही है—”जब तक एक स्त्री अपने स्वप्न को आत्मबल से थामे रहती है, तब तक वह पराजित नहीं हो सकती।” 

डॉ. संगीता कापसे के जीवन में नृत्य महज एक प्रदर्शन कला नहीं रहा—वह उनकी आत्मा की भाषा थी। जब समाज ने उन्हें रोका, जब शरीर ने जवाब दिया, जब परिवार की जिम्मेदारियाँ बढ़ीं—तब भी उन्होंने नृत्य नहीं छोड़ा। उन्होंने नृत्य को मंच पर प्रस्तुत करने से पहले अपने अंतरमन में साधा। 

उनकी कहानी यह कहती है कि नृत्य केवल ताल या गति नहीं, बल्कि वह चेतना है जो एक टूटे हुए इंसान को जोड़ सकती है। 

उन्होंने ‘नाचे मयूरी’ से प्रेरणा लेकर अपने जीवन में वही ज्वाला जगा ली। एक पैर की चोट और डॉक्टर की चेतावनी के बावजूद उन्होंने फिर से मंच पर आकर जीवन को चुनौती दी। यही तो है उनका अंतिम निर्णय—कि परिस्थितियाँ बड़ी हो सकती हैं, पर यदि आत्मा दृढ़ हो, तो हर बाधा छोटी पड़ जाती है। 

डॉ. संगीता कापसे की सबसे अद्भुत भूमिका एक गुरु की थी। उन्होंने सैकड़ों नहीं, हज़ारों बच्चों को निःशुल्क नृत्य, रंगोली, चित्रकला और अनुशासन सिखाया। वे केवल गुरुकुल चलाने वाली शिक्षिका नहीं थीं, बल्कि एक विचार थीं। 

आज जब कोई बच्चा मंच पर आत्मविश्वास से थिरकता है, जब कोई गृहिणी रंगोली में अपना आत्मबल ढूंढती है, या कोई युवती अपने हाथों से खुद की पोशाक सिलती है—तो उसमें डॉ. संगीता कापसे की आत्मा का एक अंश होता है। 

उनका यह अंतिम निर्णय स्पष्ट था—कला किसी भी व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है, और उसे सिखाना एक गुरुतर उत्तरदायित्व। 

हालाँकि डॉ. संगीता कापसे को गुरु श्री सम्मान, IIFA अवॉर्ड, राष्ट्रीय Kathak टॉप 3 रैंक जैसे कई प्रतिष्ठित पुरस्कार मिले, परंतु उनका जीवन केवल इन सम्मानों तक सीमित नहीं था। उनका असली पुरस्कार वह था, जब एक साधारण बच्चा पहली बार मंच पर खड़ा होकर आत्मविश्वास से कहता—”मैं कर सकता हूँ।” 

उन्होंने कभी प्रसिद्धि की इच्छा नहीं की, बल्कि सार्थकता की खोज की। उनका अंतिम संदेश यही रहा—“सम्मान तब तक अधूरा है, जब तक वह समाज की सेवा से न जुड़ा हो।” 

उनका जीवन कई बार टूटा, कई बार रुका, पर कभी मिटा नहीं। एक गृहिणी से नृत्यगुरु बनने की यह यात्रा किसी चमत्कार से कम नहीं थी। उन्होंने कभी हार को स्वीकार नहीं किया—चाहे वह शरीर की पीड़ा हो, पारिवारिक जिम्मेदारियाँ हों, या आर्थिक कठिनाइयाँ। वे हर सुबह एक नई उम्मीद के साथ उठतीं, जैसे सूरज हर रात के बाद फिर से उगता है। 

उनका अंतिम निर्णय जीवन के प्रति था—कि यदि आत्मसम्मान को जीवित रखना है, तो बार-बार उठना होगा, बार-बार चलना होगा, चाहे दुनिया बार-बार गिराने की कोशिश करे। 

डॉ. संगीता कापसे का जीवन केवल एक कलाकार का नहीं, बल्कि एक माँ, एक पत्नी, एक समाज-सेविका और एक सांस्कृतिक योद्धा का था। उन्होंने कभी एक भूमिका को दूसरी के लिए नहीं छोड़ा, बल्कि सबको साथ लेकर चलने की कला जानी। 

उनकी बेटी, बेटा और पति उनके साथ हमेशा एक मजबूत स्तंभ की तरह खड़े रहे, परंतु उन्होंने कभी उन पर निर्भरता नहीं जताई—बल्कि उनकी सहभागिता को प्रेरणा की तरह लिया। यही तो उनके जीवन का अंतिम मूल्य था—साथ रहो, लेकिन अपने आत्मबल को न भूलो। 

यदि हमें डॉ. संगीता कापसे के जीवन को एक वाक्य में समेटना हो, तो वह यह होगा— 

“एक साधारण स्त्री, जिसने अपने आत्मबल, कला, और समर्पण से एक असाधारण युग की शुरुआत की।” 

उनका जीवन यह सिखाता है कि न तो उम्र बाधा है, न सामाजिक सीमाएँ, न आर्थिक स्थिति। यदि किसी के भीतर सच्ची चाह हो, तो वह कला, शिक्षा और सेवा को जीवन का आधार बना सकता है। 

इस अंतिम अध्याय को लिखते हुए यह स्पष्ट होता है कि डॉ. संगीता कापसे की कहानी किसी विराम का संकेत नहीं देती—बल्कि यह एक नया आरंभ है। उनकी विरासत, उनके आदर्श, उनके सपने—सब कुछ आज भी जीवित हैं, उनकी अकादमी में, उनके शिष्यों में, और उस हर स्त्री में, जो अपने भीतर कुछ करने की आग रखती है। 

हम इस अध्याय को श्रद्धांजलि के रूप में नहीं, बल्कि एक संकल्प के रूप में देखें—कि हम भी कुछ ऐसा करें जिससे आने वाली पीढ़ियाँ गर्व से कह सकें,
“हम डॉ. संगीता कापसे की पीढ़ी से हैं।” 

Thanks
Dr. Sangita Kapse